Hindi science

Economics Importance of Bacteria in Hindi part-1

जीवाणु की लाभदायक गतिविधियाँ
(useful activities of bacteria)

I) भू-उर्वरता में वृद्धि (Increase in soil fertility) – यद्यपि वायुमंडल का लगभग 78% भाग नाइट्रोजन है ,लेकिन पौधों में इसको सीधे उपयोग करने की क्षमता नहीं होती है ।
मुक्त नाइट्रोजन को नाइट्रोजन यौगिकों में बदलने की प्रक्रिया नाइट्रोजन अनुबंधन अथवा यौगिकीकरण (nitrogen fixation) कहलाती है ।
मिट्टी से पौधों को निरन्तर नाइट्रोजनी पदार्थ उपलब्ध कराने में सहायक जीवाणुओं को तीन वर्गों में विभक्त किया गया है –
i) अमोनिकारक जीवाणु (amonifying bacteria)
ii) नाइट्रीकारक जीवाणु (nitrifying bacteria)
iii) नाइट्रोजन यौगिकीकरण जीवाणु (nitrogen fixing bacteria)
i) अमोनिकारक जीवाणु (amonifying bacteria) – मृतोपजीवी जीवाणु (saprophytic bacteria) मिट्टी में उपस्थित मृत पौधों तथा प्राणियों में उपस्थित प्रोटीन को एमीनों अम्ल में परिवर्तित कर देते है ।
अमोनिकारक जीवाणु द्वारा एमीनों अम्लों को अमोनिया में बदल दिया जाता है , यह प्रक्रिया अमोनिकरण कहलाती है ।
कुछ धान्य फसलें (cereal crops) अमोनियम यौगिकों को नाइट्रोजन के स्रोत के रूप में उपयोग करती है ।
बैसिलिस माइक्रोइडिस, बैसिलिस रेमोसस, बैसिलिस वल्गेरिस प्रमुख अमोनिकारक जीवाणु है जो भूमि की उर्वरता में वृद्धि करते है ।
ii) नाइट्रीकारक जीवाणु (nitrifying bacteria) – नाइट्रोसोमोनास, नाइट्रोबैक्टर आदि रसायन संश्लेषी स्वपोषी जीवाणु मिट्टी में उपस्थित अनोनिया को नाइट्रेट में परिवर्तित कर देते है ,यह प्रक्रिया नाइट्रीकरण (nitrification) कहलाती है । इससे भू-उर्वरता में वृद्धि होती है ।
iii) नाइट्रोजन यौगिकीकरण जीवाणु (nitrogen fixing bacteria) – ये जीवाणु मुक्त नाइट्रोजन का यौगिकीकरण करते है । एज़ोटोबैक्टर तथा क्लोस्ट्रिडियम की कुछ जातियाँ मिट्टी में स्वतंत्र रूप से नाइट्रोजन यौगिकीकरण करती है ।
लैग्यूमिनोसी कुल की ग्रंथियों में राइजोबियम लेग्यूमिनोसेरम नामक जीवाणु सहजीवी के रूप में पाया जाता है । यह जीवाणु मुक्त नाइट्रोजन को अवशोषित करके उसे नाइट्रोजन के यौगिकों में बदल देता है । और इन नाइट्रोजन यौगिकों को पौधे ग्रहण कर लेते है ,जिससे भू-उर्वरता में वृद्धि होती है ।
II) जीवाणुओं का उद्योगों में महत्व (Importance of bacteria in industries) – जीवाणुओं का उपयोग अनेक प्रकार की औद्योगिक प्रक्रियाओं को सरलतापूर्वक कराने के लिए किया जाता है ।
1. डेरी उद्योग(dairy industry) – अनेक प्रकार के डेरी उत्पाद जैसे दही, पनीर , छाँछ (butter milk) ,मक्खन आदि लैक्टिक अम्ल जीवाणुओं (lactic acid bacteria) की सक्रियता से प्राप्त किए जाते है । ये जीवाणु दूध में पाई जाने वाली लैक्टोस शर्करा को लैक्टिक अम्ल में परिवर्तित कर देते है । जिसके फलस्ववरूप दूध खट्टा हो जाता है और उसके कैसीन प्रोटीन अलग हो जाते है । लैक्टोबैसिलस केसी , लैक्टोबैसिलस एसिडोफिलम , लैक्टोबैसिलस हैल्वीटिकस, लैक्टोबैसिलस प्लानटेरम इत्यादि डेरी उत्पादों में सामान्य रूप से पाए जाते है ।
2. एल्कॉहल उद्योग (alcohol industry) – क्लॉस्ट्रिडियम नामक अवायुवीय जीवाणु द्वारा मोलैसेज का किण्वन (molasses fermentation) कराया जाता है ,जिससे ब्युटाइल ऐल्कॉहल प्राप्त होता है ।
3. सिरका उद्योग (Vinegar industry) – माइकोडर्मा नामक जीवाणु द्वारा शर्करा के घोल का किण्वन कराकर सिरका प्राप्त किया जाता है ।
4. तम्बाकू व चाय के संसाधन में (curing of tobacco and tea) – तंबाकू व चाय की पत्तियों का संसाधन जीवाणुओं की नियंत्रित क्रियाओं से किया जाता है । इन उत्पादों का रंग ,स्वाद व सुरूचि(flavour) इनके संसाधन तथा पक्वन (curing and ripening) पर निर्भर करता है ।
5. डैक्स्ट्रॉन उत्पादन (dextran production) – डैक्स्ट्रॉन उच्च अणुभार (15000 से 20,000,000) वाला एक पॉलीसैकेराइड्स है । यह ल्यूकोनास्टॉक वंश से संबंधित कुछ लैक्टिक अम्ल जीवाणुओं द्वारा कोशिकाबाह्य (extracellularly) निर्मित होता है । ये अणुभार मे भिन्न विलेय पदार्थों के भौतिक प्रभाजन (physical fractionation) के लिए प्रयुक्त किए जाते है ।
III) मृत जीवों के अपघटन में (Decomposition of dead organisms) – जीवाणु प्राकृतिक अपमार्जक(scavanger) है । यह मिट्टी में दबे मृतजीवों का अपघटन करके उन्हें सरल कार्बनिक अथवा उनके अकार्बनिक अवयवों में परिवर्तित करते है । अपघटित पदार्थ मिट्टी की उर्वरता बढ़ाते है ।
IV) मानव व जन्तु के शरीर में सहजीवी जीवाणु (Symbiotic bacteria in Human and Animal body) – मनुष्य व जनतुओं की आँतों में एसिरिकिआ कोली (E. coli) आदि अनेक जीवाणु पाए जाते है । यह अपना जीवन सहजीवी (symbiont) के रूप में व्यतीत करते है । इनके द्वारा स्त्रावित एंजाइम भोजन के पाचन में सहायक होते है । अच्छे स्वास्थ्य के लिए शरीर में इनकी उपस्थिति आवश्यक है ।
V) जीवाणुओं का औषधियों में उपयोग (use of bacteria in medicines) – जीवाणुओं का उपयोग एन्टिबायोटिक तथा सीरम(serum) अथवा वैक्सीन (vaccine) के रूप में भी किया जाता है ।
एन्टिबायोटिक (antibiotics) – सूक्ष्म जीवाणुओं से प्राप्त ऐसे उपापचयी उत्पाद (metabolic products) जो दूसरे सूक्ष्मजीवाणुओं के लिए हानिकारक अथवा निरोधी हो ऐन्टिबायोटिक कहलाते है ।
एन्टिबायोटिक का आविष्कार ए. फ्लेमिंग द्वारा 1928 में किया गया । इन्होंने पेनिसिलियम नोटेटम  से पेनिसिलिन नामक एन्टिबायोटिक को खोज ।
कुछ प्रमुख एन्टिबायोटिक ,उनके स्रोत तथा क्रिया परिसर (some important antibiotics ,their source and range of action) –

क्रं.सं. एन्टिबायोटिक जीवाणु नाम क्रियाशीलता परिसर
1. बैसिट्रासिन बैसिलस सब्टीलिस जीवाणु की कोशिका भित्ति के संश्लेषण को संदमित करता है ।
2. पॉलिमिक्सिन-G बैसिलस पॉलिमिक्सा कोशिकाद्रव्य कला को नष्ट करता है ।
3. कोलिस्टिन अथवा पॉलिमिक्सिन-E बैसिलस कोलीस्टिनस कोशिका कला को नष्ट करता है ।
4. टायरोप्रीसिन बैसिलस ब्रिविस जीवाणु की कोशिका भित्ति के संश्लेषण को संदमित करता है ।

 

2 thoughts on “Economics Importance of Bacteria in Hindi part-1

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