Reproduction in bacteria part-2 , or sexual reproduction in bacteria in Hindi

जीवाणुओं में जनन part-2

⦁ II) लैंगिक पुनर्योजन (Genetic recombination) – जीवाणुओं में लैंगिकता सर्वप्रथम टेटम तथा लीडरबर्ग द्वारा Escherichia coli (E. कोलाई = एसरिकिया कोलाई) में प्रदर्शित की गई । इनमें अन्य जीवधारियों की भाँति कोशिकाओं (युग्मकों) का संलयन नहीं होता है । जीवाणुओं में लैंगिक जनन का मुख्य लक्षण आनुवांशिक पदार्थ का विनिमय( Interchange of genetic material) है । विनिमय संयुग्मन(conjugation) अथवा विदेशज(exotic) विधियों द्वारा संपन्न होता है । संयुग्मन में आनुवांशिक पदार्थ का विनिमय एक नलिका के द्वारा होता है ,जिसे संयुग्मन नलिका (conjugation tube ) कहते है ,परन्तु विदेशज विधि द्वारा विनिमय में दो जीवाणु कभी भी एक दूसरे के संपर्क में नहीं आते है ,इसमें आनुवांशिक पदार्थ(DNA) का विनिमय रूपांतरण (Transformation) अथवा पराक्रमण ( transduction) द्वारा होता है ।

1. संयुग्मन ( conjugation) –

यद्यपि संयुग्मन अनेक जीवाणुओं में पाया जाता है परन्तु इसका विस्तृत अध्ययन ई.कोलाई में किया गया है । संयुग्मन के लिए जीवाणु के दो संगम प्ररूप (mating types) की आवश्यकता होती है । ये दोनों ही प्ररूप अगुणित होते है । इनमें एक प्ररूप कोशिका दाता कोशिका (donar cell) अथवा जननक्षम कोशिका (fertile cell , F+ ) तथा दूसरी ग्राही कोशिका (recipient cell, F- ) होती है । संयुग्मन से पूर्व दाता जीवाण्विक कोशिका के वलयित DNA की पुनरावृति (replication) होती है ।
F को उर्वरता कारक(fertility factor or F- factor) कहते है । जिस जीवाण्विक कोशिका में F-कारक होता है ,उसे F+ और जिसमें यह अनुपस्थित होता है ,उसे F- कहते है ।
जब दो विपरित प्ररूप ( F+ व F- ) की कोशिकाएँ निकट आति है तो दाता कोशिका लैंगिक रोमों (sex pili) की सहायता से ग्राही कोशिका से संलग्न हो जाती है । दोनों प्ररूपों के संलग्न बिन्दू पर संयुग्मन नलिका (conjugation tube ) बनती है । जिसके द्वारा दाता कोशिका का आनुवांशिक पदार्थ ग्राही कोशिका में प्रवेश कर जाता है ।
दाता कोशिका जिसे नर प्ररूप (male type) भी कहते है ,का एक विशिष्ट लक्षण इनके गुणसूत्र में उर्वरता कारक(fertility factor or F- factor) की उपस्थिति है । यह कारक जब दाता कोशिका से ग्राही कोशिका (स्त्री प्ररूप) में चला जाता है तो ग्राही कोशिका F+ में परिवर्तित हो जाती है ।
एसरिकिया के अतिरिक्त स्यूडोमोनास ,साल्मोनेला ,विब्रियो में भी संयुग्मन पाया जाता है ।

2. रूपांतरण (Transformation) – वह प्रक्रिया जिसमें एक जीवाण्विक कोशिका का DNA दूसरी जीवाण्विक कोशिका में उस माध्यम द्वारा प्रवेश करता है जिसमें जीवाणु वृद्धि कर रहे हों, रूपांतरण कहलाती है ।
ऐसी कोशिकाएँ जिनमें रूपांतरण संभव हो , समर्थ कोशिकाएँ (competent cells) कहलाती है । तथा DNAरज्जुक का वह अंश जिसमें रूपांतरण की योग्यता निहित होती है ,रूपांतरण कारक ( transfer factor) कहलाता है ।
रूपांतरण की खोज- रूपांतरण की खोज का श्रेय फ्रेडेरिक ग्रिफिथ को जाता है । इन्होंने स्ट्रेप्टोकोकस निमोनी ( जीवाणु जो निमोनिया के लिए जिम्मेदार है ) के साथ कई प्रयोगों से रूपांतरण की अच्छे ढ़ंग से व्याख्या की है ।
ग्रिफिथ का प्रयोग – जब स्ट्रेप्टोकोकस निमोनी (न्यूमोकोकस) जीवाणु की संवर्धन प्लेट पर वृद्धि करता है तब इसकी कुछ चिकनी चमकीली कालोनी( S-प्रभेद) व दूसरी खुरदरी कालोनी(R-प्रभेद) का निर्माण होता है । S-प्रभेद के जीवाणु में श्लेष्मा (बहुशर्कराइड) युक्त आवरण होता है । S-प्रभेद उग्र होते है अथवा निमोनिया रोग उत्पन्न करते है जबकी R-प्रभेद द्वारा निमोनिया नहीं होता है ।

जब ताप से मृत S-प्रभेद के जीवाणुओं को चूहे में प्रवेश कराते है तो चूहा जीवित रहता है क्योंकि गर्म करने से जीवाणु मर जाते है और रोग उत्पन्न नहीं करते है । लेकिन जब ताप से मृत S-प्रभेद को R-प्रभेद के साथ प्रवेश कराते है तो चूहा मर जाता है क्योंकि गर्म करने से S-प्रभेद के जीवाणु मर जाते है परन्तु उनका आनुवांशिक पदार्थ DNA नष्ट नहीं होता है जिसमें रूपांतरण की क्षमता होती है और यह रूपांतरण कारक DNA R-प्रभेद के जीवाणुओं में कोशिका भित्ति में उपस्थित छिद्रों के माध्यम से प्रवेश कर जाता है ,जिसके पश्चात् R-प्रभेद के जीवाणु ,S-प्रभेद के जीवाणुओं में परिवर्तित हो जाते है और ये निमोनिया रोग उत्पन्न करते है जिसके काऱण चूहा मर जाता है ।
ग्रिफिथ अपनों प्रयोगों के द्वारा यह नहीं बता सके की रूपांतरण कारक DNA होता है । तत्पश्चात् एवेरी, मैक्लीऑइड तथा मैकार्टे ने प्रयोगशाला में प्रयोगों से प्रदर्शित किया कि रूपांतरण कारक DNA होता है ।

3. पराक्रमण ( transduction) – वह प्रक्रिया जिसमें आनुवांशिक पदार्थ दाता कोशिका से ग्राही कोशिका को स्थानांतरण जीवाणुभोजी (bacteriophage) द्वारा होता है , पराक्रमण कहलाती है ।
इसका अध्ययन सर्वप्रथम जिन्डर व लेडरबर्ग द्वारा सैल्मोनेला टाइफीम्यूरियम नामक जीवाणु में किया गया । उन्होने देखा कि विभोजी कण (phage particle) किसी विशिष्ट जीवाणु कोशिका पर आक्रमण करके उस विशिष्ट जीवाणु के लक्षण(X) ग्रहण कर लेता है और जब वह विभोजी किसी अन्य जीवाणु कोशिका पर आक्रमण करता है तो विशिष्ट लक्षण (X) उस जीवाणु को स्थानांतरित हो जाते है ।
पराक्रमण दो प्रकार का होता है –
i) विशिष्ट पराक्रमण (specialised transduction)
ii) व्यापकीकृत पराक्रमण (generalised transduction)

i) विशिष्ट पराक्रमण (specialised transduction) – विशिष्ट पराक्रमण के मुख्य चरण निम्न है –
अ) जीवाणुभोजी जीवाणु के ग्राही स्थल (receptor site) पर संलग्न हो जाता है तथा विभोजी का न्युक्लिक अम्ल (nucleic acid) जीवाणु कोशिका के कोशिकाद्रव्य में स्थानांतरित हो जाता है ।
ब) विभोजी का न्युक्लिक अम्ल जीवाणु कोशिका में कुछ विशेष प्रकार के प्रोटीन बनाने के लिए कोडित होता है , इन्हें दमनकर प्रोटीन(repressor protein) कहते है । इनका कार्य जीवाणु कोशिका में विभोजी कणों का संश्लेषण (synthesis of phage particles) रोकना है ।
विभोजी का DNA जीवाणु कोशिका में खण्डों (Fregments) के रूप में रहता है ,जिन्हें प्रोफाज( prophage) कहते है । प्रोफाज जीवाणु कोशिका के कोशिकाद्रव्य में स्वतंत्र रूप से वितरित अथवा जीवाणु के गुणसूत्र पर संलग्न रहते है । प्रोफाज युक्त जीवाणु कोशिका लयजनक (Lysogenic) कहलाती है । जीवाणु कोशिका अनेक पीढ़ियों तक लयजनक रह सकती है । तथा विभोजी DNA जीवाणु के गुणसूत्र के साथ विभाजित होता रहता है । परन्तु एक अवस्था ऐसी आती है जब जीवाणु कोशिका में दमनकारी प्रोटीन का संश्लेषण रूक जाता है तथा इसमें विभोजी घटकों का संश्लेषण (synthesis of phage components) प्रारंभ हो जाता है । और इनमें विभोजी प्रोटीन का संश्लेषण भी होने लगता है ।
स) विभोजी DNA जब जीवाणु गुणसूत्र से टूटता है तब जीवाणु के कुछ जीन भी इसके साथ संलग्न हो जाते है । इनकी पुनरावृति विभोजी DNA के साथ होती रहती है । तथा ये नए विभोजी कणों का एक भाग बन जाते है । जब नए विभोजी कण किसी अन्य जीवाणु कोशिका को संक्रमित करते है तो इनमें उपस्थित जीवाणु जीन भी नई जीवाणु कोशिका के गुणसूत्र में समावेशित हो जाते है । नई जीवाणु कोशिका (recombined cell) के गुणसूत्र में अपने जीनों के अतिरिक्त मातृ अथवा पहली वाली जीवाणु कोशिका के जीन भी होते है ।


आनुवांशिक पदार्थ का यह विनिमय विशिष्ट पराक्रमण कहलाता है । इसमें जीवाणु गुणसूत्र से केवल कुछ विशिष्ट जीन का ही स्थनांतरण होता है ।
अथवा
जीवाणुभोजी द्वारा एक जीवाणु कोशिका के विशिष्ट जीनों का अन्य जीवाणु कोशिका के गुणसूत्र में समावेशन होना , विशिष्ट पराक्रमण कहलाता है ।

ii) व्यापकीकृत पराक्रमण (generalised transduction) – विशिष्ट पराक्रमण की तुलना में व्यापकीकृत पराक्रमण एक अधिक सामान्य घटना है ।

इसमें निम्न चरण होते है –

अ) लयजनक जीवाणु कोशिका में उपस्थित विभोजी DNA नये विभोजी घटकों का संश्लेषण करता है । इस प्रक्रिया में जीवाणु कोशिका का गुणसूत्र खंडित हो जाता है । तथा इन खण्डों का कुछ नये विभोजी DNA में समावेशन हो जाता है । इस प्रकार लयजनक कोशिका में उपस्थित कुछ विभोजियों में केवल विभोजी DNA होता है ,जबकि अन्य में जीवाणु गुणसूत्र के खण्ड समावेशित होते है ।

ब) यदि ऐसे विभोजी ,जिनमें जीवाणु गुणसूत्र के खण्ड समावेशित होते है ,जब वे अन्य विभेद की जीवाणु कोशिका को संक्रमित करते है तो विभोजी तो विभोजी में उपस्थित मातृ जीवाणु कोशिका के जीन नई जीवाणु कोशिका को स्थानांतरित हो जाते है । इस प्रकार इन विभोजी कण में पराक्रमण की क्षमता होती है । इसके विपरित ऐसे विभोजी जिनमें केवल विभोजी DNA हो ,वह पराक्रमण की दृष्टि से अनुपयोगी है ।

 

Reproduction in bacteria part-1

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