Nutrition of bacteria in Hindi

बैक्टिरिया का पोषण 

⦁ पोषण के आधार पर जीवाणुओं को निम्नलिखित दो वर्गों में विभक्त किया जा सकता है –
I) स्वपोषित जीवाणु ( Autotrophic bacteria )
II) परपोषित जीवाणु ( Heterotrophic bacteria )
I) स्वपोषित जीवाणु ( Autotrophic bacteria ) – वे जीवाणु जिनमें कार्बनिक तथा अकार्बनिक पदार्थों से अपना भोजन स्वयं बनाने की क्षमता होती है , स्वपोषित जीवाणु ( Autotrophic bacteria ) कहलाते है ।
ऊर्जा के स्रोत के आधार पर स्वपोषित जीवाणु ( Autotrophic bacteria ) दो प्रकार के होते है –
1. प्रकाश संश्लेषी जीवाणु ( Photosynthetic bacteria )
2. रसायन संश्लेषी जीवाणु ( Chemosynthetic bacteria )
1. प्रकाश संश्लेषी जीवाणु ( Photosynthetic bacteria ) – ये जीवाणु प्रकाश की उपस्थिति में अपना भोजन स्वयं बनाते है । इन्हें प्रकाश स्वपोषित (photoautotrophic ) अथवा प्रकाश कार्बनिक पोषित ( photolithotrophic) भी कहा जाता है । इनमें उच्च पौधों के समान विकिरण ऊर्जा का उपयोग करने की क्षमता होती है । उच्च पौधों में हाइड्रोजन दाता (Hydrogen donar ) जल है तथा जल के प्रकाश-अपघटन ( photolysis) से ऑक्सीजन विमुक्त होती है । इसके विपरीत स्वपोषित जीवाणुओं में हाइड्रोजन दाता जल के अतिरिक्त कोई अन्य पदार्थ होता है ,अतः इनमें ऑक्सीजन का विमोचन नहीं होता है । इस प्रकार के सभी जीवाणु अवायुवीय ( anaerobic ) होते है । ये जीवाणु कार्बन , अकार्बनिक स्रोतों जैसे कार्बनडाई ऑक्साइड (CO2) से प्राप्त करते है ।
प्रकाश संश्लेषी जीवाणु निम्न प्रकार के होते है –
a) हरित-गंधक जीवाणु ( green sulphur bacteria ) – ये सूक्ष्म ,अचल , दण्डाणु जीवाणु है , जो स्पष्ट रूप से अवायुवीय प्रकाश स्वपोषित (anaerobic photoautotrophs ) होते है । इन जीवाणुओं में प्रकाश संश्लेषी वर्णक क्लोरोबियम क्लोरोफिल होता है । ये वर्णक जीवद्रव्य कला के अंतर्वलित क्षेत्रों में स्थित हते है तथा कोशिका में समान रूप से वितरित रहते है । इनमें CO2 का अवकरण ( अपचयन = Reduction) हाइड्रोजन सल्फाइड ( H2S ) द्वारा होता है तथा उपोत्पाद के रूप में सल्फर प्राप्त होता है , जिसके ऑक्सीकरण से सल्फ्यूरिक अम्ल ( H2SO4) बनता है । ये जीवाणु हाइड्रोजन सल्फाइड ( H2S ) या अन्य किसी सल्फाइड अथवा सल्फाइट की उपस्थिति में ही उगते है ।
उदाहरण- क्लोरोबियम , क्लोरोस्यूडोमोनास
समाकरण –
6CO2 + 12H2C6H12O6 + 6H2O + 12S
b) बैंगनी-गंधक जीवाणु – ये भी प्रकाश स्वपोषित जीवाणु है । इनमें प्रकाश संश्लेषी वर्णक बैक्टिरियोक्लोरोफिल a एवं b होता है । इसमें अपचायक सल्फर युक्त कार्बनिक योगिक होते है । इनमें उपोत्पाद सल्फर नहीं होता है । उदाहरण – क्रोमैटियम , अमीबोबेक्टर , थायोकैप्सा
c) गंधक विहिन बैंगनी जीवाणु – ये ऐसे गतिशील जीवाणु है जो गैस रिक्तिकाएँ निर्मित नहीं करते है तथा कोशिका में गंधक कभी संचित नहीं करते है । इनमें प्रकाश संश्लेषी वर्णक बैक्टिरियोक्लोरोफिल होता है ।
बैंगनी-गंधक जीवाणुओं के विपरीत गंधक विहिन बैंगनी जीवाणु ऑक्सीजन की उपस्थिति में वृद्धि कर सकते है ।
2. रसायन संश्लेषी जीवाणु ( Chemosynthetic bacteria ) – ये अप्रकाश संश्लेषी परन्तु स्वपोषी जीवाणु होते है । इनको अपना भोजन बनाने के लिए ऊर्जा अमोनिया, नाइट्राइट , नाइट्रेट, फैरस आयरन , हाइड्रोजन सल्फाइड आदि अनेक अकार्बनिक पदार्थों के ऑक्सीकरण से प्राप्त होती है । इसमें निम्न प्रकार के जीवाणु आते है –
a) गंधक जीवाणु- ये जीवाणु गंधक युक्त जलीय अथवा स्थलीय आवासों में रहते है । तथा उसमें उपस्थित गंधक के यौगिकों का ऑक्सीकरण कर ऊर्जा प्राप्त करते है । उदाहरण- बेगियाटोआ, थायोबैसिलस, थायोऑक्सीडैन्स
b) आयरन जीवाणु – ये जीवाणु आयरन युक्त जल में पाए जाते है । तथा उसमें उपस्थित फैरस यौगिकों का ऑक्सीकरण कर फैरिक रूप में बदल देते है । तथा इस क्रिया में विमुक्त ऊर्जा का उपयोग आवश्यक कार्बनिक पदार्थों के संश्लेषण में करते है ।
उदाहरण – फैरोबैसिलस , लेप्टोथ्रिक्स , स्फीरोटिलस
c) हाइड्रोजन जीवाणु – ये जीवाणु भूमिगत होते है तथा भूमि के अन्दर स्थित आण्विक हाइड्रोजन का ऑक्सीकरण करते है । इस क्रिया में ऊर्जा तथा जल प्राप्त होते है ।
उदाहरण – स्यूडोमोनास सैकेरोफिला , स्यूडोमोनास फैसिलिस
d) नाइट्रीकारक जीवाणु – ये मृदोढ़ अविकल्पी स्वपोषित ( soil born obligate autotrophs ) जीवाणु है जिनमें विशिष्ट अकार्बनिक ऊर्जा स्रोत की अनुपस्थिति में उगने की सामर्थ्य नहीं होती है । ये अमोनिया को नाइट्रेट में ऑक्सीकृत करते है ।
नाइट्रीकरण करण की प्रक्रिया दो चरणों में पूर्ण होती है –
प्रथम चरण – इस चरण में नाइट्रोसोमोनास यूरोपिया आदि कुछ जीवाणु अमोनिया को नाइट्राइट में ऑक्सीकृत कर ऊर्जा प्राप्त करते है ।
समीकरण-
2NH3 + 3O2  → 2NO2 + 2H2O + 2H + ऊर्जा
द्वितीय चरण – इस चरण में नाइट्रोबेक्टर आदि जीवाणु नाइट्राइट को नाइट्रेट में ऑक्सीकृत कर ऊर्जा प्राप्त करते है ।
समीकरण –
NO2–   +   1/2 O2      NO3 + ऊर्जा

II) परपोषित जीवाणु – वे जीवाणु जो अन्य जीवधारियों से अपना तैयार भोजन ग्रहण करते है , परपोषित जीवाणु कहलाते है । पोषण विधि के आधार पर इन जीवाणुओं को परजीवी, मृतोपजीवी तथा सहजीवी वर्गों में बांटा गया है ।
1. परजीवी जीवाणु (parasite bacteria) – वे जीवाणु जो अपना भोजन जीवित जीवधारियों से प्राप्त करते है , परजीवी जीवाणु कहलाते है । परजीवी जीवाणु भोजन के लिए जिन जीवधारियों पर आश्रित होते है , व परपोषी (host) कहलाते है ।
जो परजीवी जीवाणु पौधों व प्राणियों में रोग करते है , वे रोगजनक ( pathogenic) कहलाते है । जैन्थोमोनास सिट्राई, साल्मोनेला टाइफी , माइक्रोबैक्टिरियम ट्यूबरक्लोसिस, स्ट्रेप्टोकोकस निमोनिई आदि रोगजनक परजीवी जीवाणु है ।
2. मृतोपजीवी जीवाणु (saprophytic bacteria) – वे जीवाणु जो सड़े-गले कार्बनिक पदार्थों पर पाए जाते है और उनका विघटन करके अपना भोजन ग्रहण करते है , मृतोपजीवी जीवाणु कहलाते है । विघटन की क्रिया से जटिल कार्बनिक पदार्थ सरल कार्बनिक पदार्थों अथवा उनके अकार्बनिक अवयवों में परिवर्तित हो जाते है । मृतोपजीवी जीवाणु द्वारा कार्बोहाइड्रेट तथा प्रोटीन का विघटन क्रमशः किण्वन (fermentation ) व पूयन (putrifaction) कहलाता है ।
a) किण्वन – मृतोपजीवी जीवाणुओं द्वारा जटिल कार्बोहाइड्रेट का सरल कार्बोहाइड्रेट में विघटन करना , किण्वन कहलाता है ।
जैसे – यीस्ट द्वारा शर्करा का किण्वन एक सामान्य प्रक्रिया है । इसमें CO2 विमुक्त होती है ।
दूध का फटना अथवा दूध से दही का बनना – इसका कारण लैक्टिक अम्ल किण्वन (lactic acid fermentation) है । जीवाणुओं (लेक्टोबैसिलस जीवाणु) द्वारा स्त्रावित लैक्टेज एंजाइम दूध में उपस्थित लैक्टोज शर्करा को ग्लूकोज में परिवर्तित कर देते है । तत्पश्चात् ग्लूकोज लैक्टिक अम्ल जीवाणु द्वारा अम्ल में परिवर्तित हो जाता है । जिसके कारण दूध फट जाता है अथवा दूध दही में परिवर्तित हो जाता है ।
b) पूयन ( putrifaction ) – अनेक प्रकार के जीवाणु प्रोटीन का विघटन करते है ,इस प्रक्रिया को पूयन कहते है । पूयन की प्रारंभिक अवस्थाओं में प्रोटीन का अपचयन पैप्टोन ,पॉलिपैप्टाइड ,पैप्टाइड तथा एमीनों अम्ल में होता है । अपचयन अवायुवीय जीवाणुओं द्वारा स्त्रावित एंजाइम द्वारा होता है । अतः इस क्रिया में ऑक्सीजन की आवश्यकता नहीं होती है । परन्तु अनेक मृतोपजीवी जीवाणु ऐमीनों अम्लों का विघटन मीथेन, CO2 , NH3 , H2 , N2 आदि मे करते है । इस क्रिया में ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है ।
3. सहजीवी जीवाणु (Symbiotic bacteria ) – वे जीवाणु जो परपोषी को बिना कोई हानि पहुँचाए अपना भोजन प्राप्त करते है और साथ ही परपोषी को भी लाभान्वित करते है , सहजीवी जीवाणु कहलाते है । यह संबंध दोनों के लिए लाभकारी व अरोगजनक होता है ।
उदाहरण-
अ) आंत में रहने वाले ई. कोलाई जीवाणु अनेक प्रकार के एंजाइम स्त्रावित करते है जो सेल्यूलोज का विघटन करते है ।
ब) लेग्यूमिनोसी कुल के पौधों की जड़ों की ग्रंथियों में उपस्थित राइजोबियम जीवाणु वायुमण्डलीय नाइट्रोजन का यौगिकीकरण कर परपोषी को उपलब्ध कराते है और इसके बदले में परपोषी से आश्रय तथा कार्बोहाइड्रेट प्राप्त करते है ।
परपोषी के साहचर्य के आधार पर सहजीवी जीवाणु दो प्रकार के होते है –
a) अंतः सहजीवी (endosymbionts) – ये जीवाणु परपोषी के शरीर के अन्दर रहते है । मनुष्य व जानवरों की आंत में रहने वाले जीवाणु इस समूह के अच्छे उदाहरण है ।
b) बाह्य सहजीवी ( actosymbionts) – ऐसे जीवाणु परपोषी की बाह्य सतह पर वृद्धि करते है ।

One thought on “Nutrition of bacteria in Hindi

  • September 25, 2019 at 11:22 am
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