Class 10 Science Notes

जैव प्रक्रम (Life Processes) : कक्षा 10 विज्ञान अध्याय 5

📘 परिचय – जैव प्रक्रम (Life Processes) – सभी जीवधारियों को जीवित रहने, वृद्धि करने, शरीर की मरम्मत करने तथा ऊर्जा प्राप्त करने के लिए अनेक आवश्यक क्रियाएँ निरंतर करनी पड़ती हैं। इन क्रियाओं के समूह को जैव प्रक्रम (Life Processes) कहा जाता है। भोजन प्राप्त करना, उसका पाचन, श्वसन, पदार्थों का परिवहन तथा अपशिष्ट पदार्थों का निष्कासन—ये सभी जीवन को बनाए रखने वाले आवश्यक प्रक्रम हैं। NCERT के अनुसार ये प्रक्रम जीव के विश्राम की अवस्था में भी लगातार चलते रहते हैं। 

इस अध्याय में हम पोषण, श्वसन, परिवहन तथा उत्सर्जन जैसे प्रमुख जैव प्रक्रमों का अध्ययन सरल भाषा में करेंगे।

📚 विषय सूची

  • जैव प्रक्रम (Life Processes)
  • जीवन प्रक्रम क्या हैं?
  • जीवन प्रक्रमों की आवश्यकता
  • पोषण (Nutrition)
  • स्वपोषी पोषण (Autotrophic Nutrition)
  • प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis)
  • प्रकाश संश्लेषण के लिए आवश्यक परिस्थितियाँ
  • रंध्र (Stomata) एवं गैसों का आदान-प्रदान
  • विषमपोषी पोषण (Heterotrophic Nutrition)
  • अमीबा में पोषण
  • पैरामीशियम में पोषण
  • मनुष्य में पोषण
  • मानव पाचन तंत्र
  • श्वसन
  • परिवहन
  • उत्सर्जन
  • महत्वपूर्ण तथ्य
  • FAQs
  • प्रतियोगी परीक्षा टिप्स
  • निष्कर्ष

जैव प्रक्रम (Life Processes)

वे सभी आवश्यक जैविक क्रियाएँ, जो किसी जीव को जीवित रखने, वृद्धि करने, शरीर की मरम्मत करने तथा जीवन का संतुलन बनाए रखने के लिए निरंतर होती रहती हैं, जैव प्रक्रम (Life Processes) कहलाती हैं।

जैव प्रक्रम वे सभी क्रियाएँ हैं जो किसी जीव के शरीर को कार्यशील बनाए रखती हैं। भोजन प्राप्त करना, ऊर्जा बनाना, ऑक्सीजन ग्रहण करना, पोषक पदार्थों का परिवहन तथा अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकालना इन्हीं प्रक्रमों का भाग हैं। ये क्रियाएँ जीव के आराम करने या सोने की अवस्था में भी लगातार चलती रहती हैं। 

मुख्य जैव प्रक्रम

  • पोषण (Nutrition)
  • श्वसन (Respiration)
  • परिवहन (Transportation)
  • उत्सर्जन (Excretion)

जीवन प्रक्रम क्या हैं?

जीवित रहने के लिए आवश्यक सभी अनुरक्षण (Maintenance) क्रियाओं को जीवन प्रक्रम (Life Processes) कहते हैं।

सभी जीवों के शरीर में अनेक प्रकार की कोशिकाएँ और ऊतक होते हैं, जिनका निरंतर रखरखाव आवश्यक होता है। शरीर की मरम्मत, वृद्धि तथा ऊर्जा की पूर्ति के लिए आवश्यक क्रियाएँ ही जीवन प्रक्रम कहलाती हैं। यदि ये प्रक्रम बंद हो जाएँ, तो जीवित रहना संभव नहीं होता। 

जीवन प्रक्रमों की आवश्यकता

जीवित शरीर में लगातार अनेक रासायनिक एवं जैविक क्रियाएँ होती रहती हैं। इन क्रियाओं के लिए ऊर्जा तथा कच्चे पदार्थों की आवश्यकता होती है। यही कारण है कि प्रत्येक जीव में जीवन प्रक्रम निरंतर चलते रहते हैं। 

जीवन प्रक्रम आवश्यक क्यों हैं?

  • शरीर को ऊर्जा प्रदान करने के लिए।
  • वृद्धि एवं विकास के लिए।
  • नई कोशिकाओं के निर्माण के लिए।
  • क्षतिग्रस्त ऊतकों की मरम्मत के लिए।
  • शरीर के सभी अंगों को कार्यशील बनाए रखने के लिए।
  • अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकालने के लिए।
  • शरीर में संतुलन (Homeostasis) बनाए रखने के लिए।

पोषण (Nutrition)

जीवों द्वारा भोजन प्राप्त करने तथा उसका उपयोग ऊर्जा, वृद्धि एवं शरीर की मरम्मत के लिए करने की प्रक्रिया को पोषण (Nutrition) कहते हैं।

जीवों को ऊर्जा तथा नए ऊतकों के निर्माण के लिए भोजन की आवश्यकता होती है। भोजन से प्राप्त कार्बोहाइड्रेट, वसा एवं प्रोटीन शरीर को ऊर्जा तथा आवश्यक कच्चा पदार्थ प्रदान करते हैं। अलग-अलग जीव अपने भोजन प्राप्त करने के लिए विभिन्न प्रकार की पोषण विधियाँ अपनाते हैं। 

पोषण के प्रमुख प्रकार

  • स्वपोषी पोषण (Autotrophic Nutrition)
  • विषमपोषी पोषण (Heterotrophic Nutrition)

स्वपोषी पोषण (Autotrophic Nutrition)

जब कोई जीव सरल अकार्बनिक पदार्थों (कार्बन डाइऑक्साइड एवं जल) से सूर्य के प्रकाश तथा क्लोरोफिल की उपस्थिति में अपना भोजन स्वयं बनाता है, तो इस प्रकार के पोषण को स्वपोषी पोषण (Autotrophic Nutrition) कहते हैं।

स्वपोषी जीव अपना भोजन स्वयं बनाते हैं। हरे पौधे, शैवाल तथा कुछ जीवाणु इस प्रकार का पोषण अपनाते हैं। ये कार्बन डाइऑक्साइड एवं जल का उपयोग करके प्रकाश संश्लेषण द्वारा कार्बोहाइड्रेट का निर्माण करते हैं। अतिरिक्त भोजन पौधों में स्टार्च (Starch) के रूप में तथा जन्तुओं में ग्लाइकोजन (Glycogen) के रूप में संचित रहता है। 

स्वपोषी पोषण के लिए आवश्यक कच्चे पदार्थ

  • कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂)
  • जल (H₂O)
  • सूर्य का प्रकाश
  • क्लोरोफिल (हरितलवक)

प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis)

वह प्रक्रिया जिसमें हरे पौधे सूर्य के प्रकाश तथा क्लोरोफिल की उपस्थिति में कार्बन डाइऑक्साइड और जल से भोजन (ग्लूकोज़) का निर्माण करते हैं तथा ऑक्सीजन मुक्त करते हैं, प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) कहलाती है।

प्रकाश संश्लेषण पौधों में भोजन निर्माण की प्रमुख प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया में सूर्य का प्रकाश ऊर्जा प्रदान करता है तथा क्लोरोफिल इस ऊर्जा को अवशोषित करता है। निर्मित ग्लूकोज़ का कुछ भाग ऊर्जा के लिए उपयोग होता है, जबकि शेष स्टार्च के रूप में संग्रहित कर लिया जाता है। 

प्रकाश संश्लेषण का रासायनिक समीकरण

6CO₂ + 12H₂O → C₆H₁₂O₆ + 6O₂ + 6H₂O
(सूर्य का प्रकाश एवं क्लोरोफिल की उपस्थिति में)

नोट : कई पुस्तकों में प्रकाश संश्लेषण का सरलीकृत समीकरण
6CO₂ + 6H₂O → C₆H₁₂O₆ + 6O₂

प्रकाश संश्लेषण की प्रमुख घटनाएँ

  • प्रकाश संश्लेषण के दौरान निम्नलिखित तीन प्रमुख घटनाएँ होती हैं—
  • क्लोरोफिल द्वारा सूर्य के प्रकाश की ऊर्जा का अवशोषण।
  • प्रकाश ऊर्जा का रासायनिक ऊर्जा में परिवर्तन तथा जल का हाइड्रोजन एवं ऑक्सीजन में विघटन।
  • कार्बन डाइऑक्साइड का अपचयन होकर कार्बोहाइड्रेट (ग्लूकोज़) का निर्माण। 

प्रकाश संश्लेषण के लिए आवश्यक परिस्थितियाँ

प्रकाश संश्लेषण सफलतापूर्वक होने के लिए निम्नलिखित परिस्थितियाँ आवश्यक हैं—

  • ☀️ सूर्य का प्रकाश
  • 🍃 क्लोरोफिल
  • 🌿 कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂)
  • 💧 जल (H₂O)
  • 🌱 उपयुक्त तापमान

रंध्र (Stomata) एवं गैसों का आदान-प्रदान

पत्तियों की सतह पर स्थित सूक्ष्म छिद्रों को रंध्र (Stomata) कहते हैं।

रंध्र पौधों में गैसों के आदान-प्रदान तथा वाष्पोत्सर्जन का प्रमुख माध्यम हैं। प्रत्येक रंध्र दो रक्षक कोशिकाओं (Guard Cells) से घिरा रहता है, जो रंध्र के खुलने एवं बंद होने को नियंत्रित करती हैं। 

रंध्र के कार्य

  • प्रकाश संश्लेषण के लिए CO₂ को अंदर प्रवेश कराना।
  • O₂ को बाहर निकालना।
  • श्वसन के समय गैसों का आदान-प्रदान करना।
  • वाष्पोत्सर्जन में सहायता करना।
  • रंध्र कैसे खुलते और बंद होते हैं?
  • जब रक्षक कोशिकाओं में जल प्रवेश करता है, तो वे फूल जाती हैं और रंध्र खुल जाता है।
  • जब रक्षक कोशिकाओं से जल बाहर निकलता है, तो वे सिकुड़ जाती हैं और रंध्र बंद हो जाता है। 

जैव प्रक्रम (Life Processes) अध्याय का NCERT शैली का चित्र, जिसमें रंध्र (Stomata) के खुलने एवं बंद होने की प्रक्रिया, रक्षक कोशिकाएँ (Guard Cells), रंध्र छिद्र तथा गैसों के आदान-प्रदान को स्पष्ट रूप से दर्शाया गया है।

चित्र – रंध्र का खुलना एवं बंद होना

विषमपोषी पोषण (Heterotrophic Nutrition)

जब कोई जीव अपना भोजन स्वयं नहीं बना सकता तथा भोजन के लिए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अन्य जीवों पर निर्भर रहता है, तो इस प्रकार के पोषण को विषमपोषी पोषण (Heterotrophic Nutrition) कहते हैं।

विषमपोषी जीव जटिल कार्बनिक पदार्थों को भोजन के रूप में ग्रहण करते हैं। ये भोजन को एंजाइमों की सहायता से सरल पदार्थों में बदलते हैं, जिन्हें शरीर द्वारा अवशोषित एवं उपयोग किया जाता है। सभी जन्तु, कवक तथा अधिकांश सूक्ष्मजीव विषमपोषी होते हैं। 

विषमपोषी पोषण के प्रमुख प्रकार

  • होलोजोइक (Holozoic) – भोजन को निगलकर पाचन करना (जैसे- मनुष्य, अमीबा)
  • परजीवी (Parasitic) – दूसरे जीव से भोजन प्राप्त करना (जैसे- अमरबेल, फीता कृमि)
  • मृतजीवी (Saprophytic) – मृत एवं सड़े-गले पदार्थों से भोजन प्राप्त करना (जैसे- कवक)

अमीबा में पोषण (Nutrition in Amoeba)

अमीबा में भोजन ग्रहण, पाचन, अवशोषण तथा उत्सर्जन की प्रक्रिया को अमीबा में पोषण कहते हैं।

अमीबा एक एककोशिकीय जीव है। यह कूटपाद (Pseudopodia) बनाकर भोजन को चारों ओर से घेर लेता है। इसके बाद भोजन भोजन रिक्तिका (Food Vacuole) में पहुँचता है, जहाँ एंजाइम भोजन का पाचन करते हैं। पचा हुआ भोजन कोशिका द्रव्य में अवशोषित हो जाता है तथा अपचित पदार्थ कोशिका की सतह से बाहर निकाल दिए जाते हैं। 

अमीबा में पोषण के चरण

  • भोजन ग्रहण (Ingestion)
  • पाचन (Digestion)
  • अवशोषण (Absorption)
  • आत्मसात (Assimilation)
  • उत्सर्जन (Egestion)

जैव प्रक्रम (Life Processes) अध्याय का शैक्षिक चित्र, जिसमें अमीबा द्वारा कूटपाद (Pseudopodia) की सहायता से भोजन ग्रहण करना, खाद्य रसधानी (Food Vacuole) का निर्माण, पाचन, अवशोषण तथा उत्सर्जन की संपूर्ण प्रक्रिया दिखाई गई है।

चित्र – अमीबा में पोषण की प्रक्रिया

पैरामीशियम में पोषण (Nutrition in Paramecium)

पैरामीशियम में सिलिया (Cilia) की सहायता से भोजन ग्रहण कर भोजन रिक्तिका में उसका पाचन करने की प्रक्रिया को पैरामीशियम में पोषण कहते हैं।

पैरामीशियम भी एक एककोशिकीय जीव है, लेकिन इसकी आकृति निश्चित होती है। इसकी सतह पर उपस्थित सिलिया (Cilia) भोजन को मुख खाँच (Oral Groove) की ओर ले जाती हैं। भोजन रिक्तिका में एंजाइम भोजन का पाचन करते हैं तथा अपचित पदार्थ कोशिका के एक निश्चित स्थान से बाहर निकाल दिए जाते हैं। �

मनुष्य में पोषण (Nutrition in Human Beings)

मनुष्य में भोजन के ग्रहण, पाचन, अवशोषण, आत्मसात एवं उत्सर्जन की संपूर्ण प्रक्रिया को मनुष्य में पोषण कहते हैं।

मनुष्य में भोजन मुख से गुदा (Anus) तक फैली एक लंबी आहार नाल (Alimentary Canal) से होकर गुजरता है। आहार नाल के प्रत्येक भाग का कार्य अलग-अलग होता है, जिससे भोजन का पूर्ण पाचन एवं अवशोषण संभव हो पाता है। 

मानव पाचन तंत्र (Human Digestive System)

भोजन के पाचन, अवशोषण तथा अपशिष्ट पदार्थों के निष्कासन में भाग लेने वाले अंगों के समूह को मानव पाचन तंत्र (Human Digestive System) कहते हैं।

मानव पाचन तंत्र के प्रमुख अंग

  • मुख (Mouth)
  • ग्रासनली (Oesophagus)
  • आमाशय (Stomach)
  • छोटी आँत (Small Intestine)
  • बड़ी आँत (Large Intestine)
  • मलाशय (Rectum)
  • गुदा (Anus)

सहायक ग्रंथियाँ

  • लार ग्रंथियाँ (Salivary Glands)
  • यकृत (Liver)
  • अग्न्याशय (Pancreas)

जैव प्रक्रम (Life Processes) अध्याय का NCERT शैली का मानव पाचन तंत्र का चित्र, जिसमें मुख, ग्रासनली, आमाशय, यकृत, अग्न्याशय, छोटी आँत, बड़ी आँत तथा मलाशय को बड़े हिंदी लेबलों सहित दर्शाया गया है।
पाचन तंत्र (Digestive System) मानव पाचन तंत्र का लेबलयुक्त आरेख। भोजन मुख से प्रवेश करता है और अन्ननली के माध्यम से पेट तक पहुँचता है। पेट के पास यकृत, पित्ताशय और अग्न्याशय सहायक पाचन अंगों के रूप में दिखते हैं। पेट से भोजन छोटी आंत में जाता है, जहाँ पाचन और पोषक तत्त्वों का अधिकांश अवशोषण होता है। इसके बाद अवशिष्ट पदार्थ बड़ी आंत, मलाशय और अंत में गुदा तक पहुँचता है।

चित्र – मानव पाचन तंत्र 

मुख (Mouth)

पाचन तंत्र का प्रारम्भिक भाग, जहाँ भोजन का चबाना तथा पाचन आरम्भ होता है, मुख (Mouth) कहलाता है।

भोजन सबसे पहले मुख में प्रवेश करता है। यहाँ दाँत भोजन को छोटे-छोटे टुकड़ों में चबाते हैं तथा जीभ भोजन को लार के साथ अच्छी तरह मिलाती है। लार में उपस्थित लार एमाइलेज (Salivary Amylase) एंजाइम स्टार्च का पाचन प्रारम्भ करके उसे सरल शर्करा में बदलना शुरू करता है। 

मुख के कार्य

  • भोजन ग्रहण करना।
  • भोजन को चबाकर छोटे टुकड़ों में बदलना।
  • भोजन को लार के साथ मिलाना।
  • स्टार्च के पाचन की शुरुआत करना।
  • भोजन को निगलने में सहायता करना।

ग्रासनली (Oesophagus)

मुख एवं आमाशय को जोड़ने वाली पेशीय नली को ग्रासनली (Oesophagus) कहते हैं।

ग्रासनली में भोजन का पाचन नहीं होता। इसकी पेशियाँ क्रमाकुंचन गति (Peristaltic Movement) द्वारा भोजन को धीरे-धीरे आमाशय तक पहुँचाती हैं। 

क्रमाकुंचन गति (Peristaltic Movement)

आहार नाल की पेशियों के क्रमिक संकुचन एवं प्रसार द्वारा भोजन को आगे बढ़ाने की प्रक्रिया को क्रमाकुंचन गति कहते हैं।

आमाशय (Stomach)

भोजन को संग्रहित कर उसका आंशिक पाचन करने वाला पेशीय थैलीनुमा अंग आमाशय (Stomach) कहलाता है।

आमाशय में भोजन अच्छी तरह मथा जाता है तथा गैस्ट्रिक ग्रंथियाँ हाइड्रोक्लोरिक अम्ल (HCl), पेप्सिन (Pepsin) तथा म्यूकस (Mucus) का स्राव करती हैं। HCl अम्लीय माध्यम बनाता है, जिससे पेप्सिन प्रोटीन का पाचन कर पाता है। म्यूकस आमाशय की भीतरी सतह को अम्ल से सुरक्षित रखता है। 

आमाशय में स्रावित पदार्थ एवं उनके कार्य

पदार्थ कार्य
हाइड्रोक्लोरिक अम्ल (HCl) अम्लीय माध्यम बनाता है तथा जीवाणुओं को नष्ट करता है।
पेप्सिन प्रोटीन का पाचन करता है।
म्यूकस आमाशय की भीतरी सतह की सुरक्षा करता है।

छोटी आँत (Small Intestine)

पाचन तंत्र का सबसे लंबा भाग, जहाँ भोजन का पूर्ण पाचन एवं अधिकांश अवशोषण होता है, छोटी आँत कहलाती है।

छोटी आँत में कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन एवं वसा का पूर्ण पाचन होता है। यहाँ यकृत, अग्न्याशय तथा आंत्र ग्रंथियों के रस मिलकर भोजन को सरल पदार्थों में बदलते हैं। 

बड़ी आँत (Large Intestine)

पाचन तंत्र का वह भाग जहाँ अपचित भोजन से जल का अवशोषण होता है, बड़ी आँत कहलाती है।

बड़ी आँत में शेष जल अवशोषित हो जाता है तथा बचा हुआ अपचित पदार्थ मल के रूप में मलाशय में पहुँचता है और अंततः गुदा द्वारा बाहर निकाल दिया जाता है। 

यकृत (Liver), अग्न्याशय (Pancreas) एवं पित्त रस (Bile Juice)

यकृत (Liver)

मानव शरीर की सबसे बड़ी ग्रंथि, जो पित्त रस का निर्माण करती है, यकृत (Liver) कहलाती है।

यकृत द्वारा निर्मित पित्त रस (Bile Juice) वसा का पाचन सीधे नहीं करता, बल्कि बड़ी वसा गोलिकाओं को छोटी-छोटी गोलिकाओं में तोड़कर पाचन को सरल बनाता है। यह आमाशय से आए अम्लीय भोजन को क्षारीय भी बनाता है, जिससे अग्न्याशयी एंजाइम प्रभावी ढंग से कार्य कर सकें ।

वसा की बड़ी-बड़ी गोलिकाओं को पित्त रस (Bile Juice) द्वारा छोटी-छोटी गोलिकाओं में बदलने की प्रक्रिया को इमल्सीकरण (Emulsification) कहते हैं।

अग्न्याशय (Pancreas)

वह ग्रंथि जो अग्न्याशयी रस (Pancreatic Juice) का स्राव करती है, अग्न्याशय कहलाती है।

अग्न्याशयी रस में उपस्थित एंजाइम भोजन के विभिन्न घटकों का पाचन करते हैं। �

पाचक एंजाइम (Digestive Enzymes)

वे जैव उत्प्रेरक (Biocatalysts) जो भोजन को सरल एवं घुलनशील पदार्थों में बदलते हैं, पाचक एंजाइम कहलाते हैं।

प्रमुख पाचक एंजाइम

एंजाइम किसके द्वारा स्रावित कार्य
लार एमाइलेज (Salivary Amylase) लार ग्रंथियाँ (Salivary Glands) स्टार्च → माल्टोज़ (सरल शर्करा)
पेप्सिन (Pepsin) आमाशय की गैस्ट्रिक ग्रंथियाँ प्रोटीन → पेप्टाइड (Peptones)
ट्रिप्सिन (Trypsin) अग्न्याशय (Pancreas) प्रोटीन/पेप्टाइड → अमीनो अम्ल
लाइपेज (Lipase) अग्न्याशय (Pancreas) वसा → वसीय अम्ल + ग्लिसरॉल
आंत्र एमाइलेज (Intestinal Amylase) छोटी आँत की आंत्र ग्रंथियाँ शेष स्टार्च → ग्लूकोज़
माल्टेज (Maltase) छोटी आँत की आंत्र ग्रंथियाँ माल्टोज़ → ग्लूकोज़
सुक्रेज (Sucrase) छोटी आँत की आंत्र ग्रंथियाँ सुक्रोज़ → ग्लूकोज़ + फ्रक्टोज़
लैक्टेज (Lactase) छोटी आँत की आंत्र ग्रंथियाँ लैक्टोज़ → ग्लूकोज़ + गैलेक्टोज़
पेप्टिडेज (Peptidase) छोटी आँत की आंत्र ग्रंथियाँ पेप्टाइड → अमीनो अम्ल
आंत्रीय लाइपेज (Intestinal Lipase) छोटी आँत की आंत्र ग्रंथियाँ शेष वसा → वसीय अम्ल + ग्लिसरॉल

नोट – पित्त रस (Bile Juice) कोई एंजाइम नहीं है।

इसका निर्माण यकृत (Liver) करता है तथा यह पित्ताशय (Gall Bladder) में संग्रहित रहता है।

अवशोषण (Absorption)

पचे हुए भोजन का छोटी आँत की दीवार से रक्त में पहुँचने की प्रक्रिया को अवशोषण (Absorption) कहते हैं।

छोटी आँत की भीतरी सतह पर असंख्य आंत्रांकुर (Villi) पाए जाते हैं। ये अवशोषण का सतह क्षेत्र बढ़ाते हैं। प्रत्येक आंत्रांकुर में रक्त केशिकाएँ होती हैं, जो पचे हुए भोजन को शरीर की कोशिकाओं तक पहुँचाती हैं। 

दंत क्षय (Dental Caries)

जीवाणुओं द्वारा दाँतों के इनेमल एवं डेंटिन के धीरे-धीरे नष्ट होने की प्रक्रिया को दंत क्षय (Dental Caries) कहते हैं।

जब भोजन के बाद दाँतों पर शर्करा रह जाती है, तो जीवाणु उस पर क्रिया करके अम्ल बनाते हैं। यह अम्ल दाँतों के इनेमल को धीरे-धीरे घुलाता है, जिससे दाँतों में सड़न (Cavity) हो जाती है। नियमित रूप से दाँत साफ करने से प्लाक हट जाता है और दंत क्षय से बचाव होता है।

श्वसन (Respiration)

वह जैविक प्रक्रिया जिसमें कोशिकाएँ भोजन (मुख्यतः ग्लूकोज़) का ऑक्सीकरण करके ऊर्जा प्राप्त करती हैं, श्वसन (Respiration) कहलाती है।

श्वसन प्रत्येक जीव की कोशिकाओं में होने वाली ऊर्जा उत्पादन की प्रक्रिया है। इसमें भोजन का विघटन होकर ऊर्जा मुक्त होती है, जिसका उपयोग वृद्धि, गति, मरम्मत तथा अन्य जैव प्रक्रमों के लिए किया जाता है। 

ध्यान दें:

श्वसन (Respiration) और श्वास (Breathing) अलग-अलग प्रक्रियाएँ हैं।

श्वास (Breathing) → ऑक्सीजन लेना एवं कार्बन डाइऑक्साइड बाहर निकालना।

श्वसन (Respiration) → कोशिकाओं में भोजन का ऑक्सीकरण करके ऊर्जा प्राप्त करना।

एरोबिक एवं एनेरोबिक श्वसन

एरोबिक श्वसन (Aerobic Respiration)

ऑक्सीजन की उपस्थिति में ग्लूकोज़ का पूर्ण ऑक्सीकरण होकर CO₂, H₂O तथा अधिक ऊर्जा बनने की प्रक्रिया एरोबिक श्वसन कहलाती है।

रासायनिक समीकरण

C₆H₁₂O₆ + 6O₂ → 6CO₂ + 6H₂O + ऊर्जा (ATP)

एनेरोबिक श्वसन (Anaerobic Respiration)

ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में ग्लूकोज़ के अपूर्ण विघटन से कम ऊर्जा प्राप्त होने की प्रक्रिया एनेरोबिक श्वसन कहलाती है।

यीस्ट में

C₆H₁₂O₆ → 2C₂H₅OH + 2CO₂ + ऊर्जा

मनुष्य की मांसपेशियों में

C₆H₁₂O₆ → 2C₃H₆O₃ + ऊर्जा

तीव्र व्यायाम के समय मांसपेशियों में ऑक्सीजन की कमी होने पर लैक्टिक अम्ल (Lactic Acid) बनता है, जिससे मांसपेशियों में ऐंठन (Cramps) होती है। 

एरोबिक एवं एनेरोबिक श्वसन में अंतर

आधार एरोबिक श्वसन एनेरोबिक श्वसन
ऑक्सीजन आवश्यक आवश्यक नहीं
ग्लूकोज़ का विघटन पूर्ण अपूर्ण
ऊर्जा अधिक (लगभग 36–38 ATP) कम (लगभग 2 ATP)
अंतिम उत्पाद CO₂ + H₂O एथेनॉल + CO₂ / लैक्टिक अम्ल
स्थान माइटोकॉन्ड्रिया कोशिकाद्रव्य (Cytoplasm)

कोशिका द्रव्य (Cytoplasm)

ग्लूकोज़ का विघटन

ग्लूकोज़ का विघटन सबसे पहले कोशिका द्रव्य (Cytoplasm) में होकर पायरुवेट (Pyruvate) बनाता है। इसके बाद पायरुवेट का आगे का विघटन ऑक्सीजन की उपलब्धता पर निर्भर करता है। 

ग्लूकोज़ के विघटन के मार्ग

  • ऑक्सीजन की उपस्थिति → CO₂ + H₂O + अधिक ATP
  • ऑक्सीजन की अनुपस्थिति (यीस्ट) → एथेनॉल + CO₂ + ATP
  • ऑक्सीजन की कमी (मांसपेशियाँ) → लैक्टिक अम्ल + ATP

ATP (ऊर्जा मुद्रा)

ATP (Adenosine Triphosphate) कोशिका की ऊर्जा मुद्रा (Energy Currency) कहलाती है।

श्वसन के दौरान मुक्त हुई ऊर्जा ATP के रूप में संग्रहित होती है। आवश्यकता पड़ने पर ATP टूटकर ऊर्जा प्रदान करता है, जिससे मांसपेशियों का संकुचन, प्रोटीन संश्लेषण तथा अन्य जैविक क्रियाएँ सम्पन्न होती हैं। 

ATP का पूरा नाम

ATP = Adenosine Triphosphate (एडेनोसिन ट्राइफॉस्फेट)

पौधों में श्वसन

पौधों में श्वसन सभी जीवित कोशिकाओं में होता है। गैसों का आदान-प्रदान मुख्यतः रंध्र (Stomata), तनों तथा जड़ों की सतह द्वारा होता है। दिन में प्रकाश संश्लेषण के कारण CO₂ का उपयोग हो जाता है तथा O₂ बाहर निकलती है, जबकि रात में केवल श्वसन होने के कारण O₂ ग्रहण तथा CO₂ का उत्सर्जन होता है। 

जलीय एवं स्थलीय जीवों में श्वसन

जलीय जीव स्थलीय जीव
जल में घुली ऑक्सीजन ग्रहण करते हैं। वायुमंडल की ऑक्सीजन ग्रहण करते हैं।
गलफड़ों (Gills) द्वारा श्वसन करते हैं। फेफड़ों/श्वसन अंगों द्वारा श्वसन करते हैं।
घुली ऑक्सीजन कम होने के कारण श्वसन दर अधिक होती है। श्वसन दर अपेक्षाकृत कम होती है।

मानव श्वसन तंत्र (Human Respiratory System)

मनुष्य में श्वसन के लिए कार्य करने वाले अंगों के समूह को मानव श्वसन तंत्र (Human Respiratory System) कहते हैं।

मानव श्वसन तंत्र वायुमंडल से ऑक्सीजन ग्रहण करके उसे शरीर की कोशिकाओं तक पहुँचाने तथा कार्बन डाइऑक्साइड को शरीर से बाहर निकालने का कार्य करता है। 

मानव श्वसन तंत्र के प्रमुख अंग

  1. नासिका (Nostrils)

श्वसन तंत्र का बाहरी द्वार है, जिसके माध्यम से वायु शरीर में प्रवेश करती है।

  1. नासिका गुहा (Nasal Cavity)

यहाँ उपस्थित बाल (Hair) एवं श्लेष्मा (Mucus) वायु को छानकर धूल, रोगाणुओं तथा अन्य अशुद्धियों को रोकते हैं। साथ ही वायु को नम एवं गर्म भी बनाते हैं। 

  1. ग्रसनी (Pharynx)

यह नासिका गुहा को श्वासनली से जोड़ती है तथा वायु को श्वासनली की ओर भेजती है।

  1. श्वासनली (Trachea)

यह उपास्थि (Cartilage) के छल्लों से बनी नली है, जो वायु को फेफड़ों तक पहुँचाती है। इसके अंदर सिलिया (Cilia) एवं श्लेष्मा उपस्थित होते हैं, जो धूल एवं सूक्ष्म कणों को बाहर निकालने में सहायता करते हैं। 

  1. श्वसनी (Bronchi)

श्वासनली दो शाखाओं में विभाजित होकर दाएँ एवं बाएँ फेफड़े में प्रवेश करती है। इन्हें श्वसनी कहते हैं।

  1. फेफड़े (Lungs)

फेफड़े श्वसन के मुख्य अंग हैं। इनमें ऑक्सीजन एवं कार्बन डाइऑक्साइड का आदान-प्रदान होता है।

  1. एल्विओलाई (Alveoli)

फेफड़ों में स्थित गुब्बारे जैसी सूक्ष्म वायुकोष्ठिकाओं को एल्विओलाई (Alveoli) कहते हैं।

यहाँ रक्त एवं वायु के बीच ऑक्सीजन तथा कार्बन डाइऑक्साइड का वास्तविक आदान-प्रदान होता है।

जैव प्रक्रम (Life Processes) अध्याय का श्वसन तंत्र का चित्र, जिसमें नासिका, श्वासनली, श्वसनी, फेफड़े तथा एल्विओलाई को बड़े हिंदी लेबलों सहित स्पष्ट रूप से दिखाया गया है।
श्वसन तंत्र (Respiratory System) मानव श्वसन तंत्र का लेबलयुक्त आरेख। वायु नासिका और नासिका गुहा से होकर ग्रसनी तथा कंठ तक जाती है। इसके बाद वायु श्वासनली से नीचे पहुँचकर दायीं और बायीं श्वसनी में विभाजित होती है तथा दोनों फेफड़ों में प्रवेश करती है। फेफड़ों के भीतर श्वसनिकाएँ वायु को सूक्ष्म वायुकोष्ठकों तक पहुँचाती हैं, जहाँ ऑक्सीजन रक्त में मिलती है और कार्बन डाइऑक्साइड बाहर निकलती है।

चित्र – मानव श्वसन तंत्र

हीमोग्लोबिन का कार्य

हीमोग्लोबिन लाल रक्त कणिकाओं में पाया जाने वाला श्वसन वर्णक है, जो ऑक्सीजन का परिवहन करता है।

हीमोग्लोबिन फेफड़ों से ऑक्सीजन को ग्रहण करके शरीर की सभी कोशिकाओं तक पहुँचाता है। कार्बन डाइऑक्साइड का अधिकांश भाग रक्त प्लाज़्मा में घुली अवस्था में परिवहन होता है। 

तम्बाकू एवं धूम्रपान के दुष्प्रभाव

तम्बाकू का सेवन स्वास्थ्य के लिए अत्यंत हानिकारक है। यह श्वसन तंत्र, हृदय तथा अन्य अंगों को प्रभावित करता है।

प्रमुख दुष्प्रभाव

  • फेफड़ों का कैंसर
  • क्रॉनिक ब्रोंकाइटिस
  • हृदय रोग
  • स्ट्रोक
  • मुख का कैंसर
  • सिलिया (Cilia) का नष्ट होना, जिससे धूल एवं रोगाणु फेफड़ों में पहुँच जाते हैं। 

परिवहन (Transportation)

शरीर के विभिन्न भागों में भोजन, ऑक्सीजन, हार्मोन एवं अन्य आवश्यक पदार्थों को पहुँचाने तथा अपशिष्ट पदार्थों को हटाने की प्रक्रिया को परिवहन (Transportation) कहते हैं।

बहुकोशिकीय जीवों में सभी कोशिकाएँ बाहरी वातावरण के सीधे संपर्क में नहीं होतीं। इसलिए भोजन, ऑक्सीजन एवं अन्य पदार्थों को प्रत्येक कोशिका तक पहुँचाने तथा अपशिष्ट पदार्थों को हटाने के लिए परिवहन तंत्र आवश्यक होता है। 

मानव में परिवहन (Transportation in Human Beings)

मनुष्य में परिवहन का कार्य रक्त परिसंचरण तंत्र (Circulatory System) द्वारा होता है, जिसमें हृदय, रक्त तथा रक्त वाहिनियाँ प्रमुख भाग हैं। 

रक्त (Blood)

रक्त एक तरल संयोजी ऊतक (Fluid Connective Tissue) है, जो शरीर में विभिन्न पदार्थों का परिवहन करता है।

रक्त का द्रव भाग प्लाज़्मा (Plasma) कहलाता है, जिसमें रक्त कोशिकाएँ तैरती रहती हैं। प्लाज़्मा भोजन, हार्मोन, कार्बन डाइऑक्साइड एवं अपशिष्ट पदार्थों का परिवहन करता है, जबकि लाल रक्त कणिकाएँ ऑक्सीजन का परिवहन करती हैं। 

रक्त के प्रमुख घटक

  1. प्लाज़्मा (Plasma)

रक्त का हल्के पीले रंग का द्रव भाग, जो लगभग 55% रक्त बनाता है। यह भोजन, हार्मोन, कार्बन डाइऑक्साइड, यूरिया तथा अन्य घुलनशील पदार्थों का परिवहन करता है। 

  1. लाल रक्त कणिकाएँ (Red Blood Corpuscles – RBC)

इनमें हीमोग्लोबिन पाया जाता है, जो फेफड़ों से ऑक्सीजन को शरीर की सभी कोशिकाओं तक पहुँचाता है। ये रक्त को लाल रंग भी प्रदान करती हैं। 

  1. श्वेत रक्त कणिकाएँ (White Blood Corpuscles – WBC)

ये शरीर को रोगजनकों (रोग उत्पन्न करने वाले सूक्ष्मजीवों) से बचाकर प्रतिरक्षा (Immunity) प्रदान करती हैं।

  1. प्लेटलेट्स (Platelets)

ये रक्त का थक्का (Blood Clot) बनाने में सहायता करती हैं, जिससे चोट लगने पर अत्यधिक रक्तस्राव रुक जाता है।

हृदय (Heart)

हृदय एक पेशीय अंग है, जो रक्त को पूरे शरीर में पम्प करता है।

मनुष्य का हृदय लगभग मुट्ठी के आकार का होता है तथा वक्ष गुहा (Chest Cavity) में दोनों फेफड़ों के बीच थोड़ा बाईं ओर स्थित होता है। इसमें चार कक्ष (Chambers) होते हैं। 

हृदय के चार कक्ष

  • दायाँ अलिंद (Right Atrium) – शरीर से आने वाला ऑक्सीजन-रहित रक्त ग्रहण करता है।
  • दायाँ निलय (Right Ventricle) – ऑक्सीजन-रहित रक्त को फेफड़ों की ओर पम्प करता है।
  • बायाँ अलिंद (Left Atrium) – फेफड़ों से आने वाला ऑक्सीजन-युक्त रक्त ग्रहण करता है।
  • बायाँ निलय (Left Ventricle) – ऑक्सीजन-युक्त रक्त को पूरे शरीर में पम्प करता है। इसकी पेशीय भित्ति सबसे मोटी होती है। 

हृदय के कपाट (Valves) रक्त को केवल एक दिशा में प्रवाहित होने देते हैं तथा उसके विपरीत दिशा में बहने से रोकते हैं। 

हृदय की कार्य प्रणाली (Working of Heart)

हृदय की कार्य प्रणाली निम्नलिखित क्रम में होती है—

  • शरीर से ऑक्सीजन-रहित रक्त महाशिरा (Vena Cava) द्वारा दाएँ अलिंद में आता है।
  • दाएँ अलिंद से रक्त दाएँ निलय में पहुँचता है।
  • दायाँ निलय रक्त को फुफ्फुसीय धमनी (Pulmonary Artery) द्वारा फेफड़ों में भेजता है, जहाँ रक्त ऑक्सीजन ग्रहण करता है।
  • ऑक्सीजन-युक्त रक्त फुफ्फुसीय शिरा (Pulmonary Vein) द्वारा बाएँ अलिंद में आता है।
  • बाएँ अलिंद से रक्त बाएँ निलय में पहुँचता है।
  • बायाँ निलय महाधमनी (Aorta) द्वारा ऑक्सीजन-युक्त रक्त को पूरे शरीर में पम्प करता है। 

📌 परीक्षा हेतु याद रखें

शरीर → दायाँ अलिंद → दायाँ निलय → फेफड़े → बायाँ अलिंद → बायाँ निलय → शरीर

जैव प्रक्रम (Life Processes) अध्याय का मानव हृदय का NCERT शैली का चित्र, जिसमें दायाँ एवं बायाँ आलिंद, निलय, प्रमुख रक्त वाहिकाएँ, कपाट तथा रक्त प्रवाह को बड़े हिंदी लेबलों के साथ दिखाया गया है।

चित्र  -मानव हृदय की संरचना

दोहरा परिसंचरण (Double Circulation)

जब एक पूर्ण रक्त परिसंचरण के दौरान रक्त एक बार फेफड़ों तथा एक बार पूरे शरीर में जाने के लिए हृदय से दो बार होकर गुजरता है, तो उसे द्विगुण परिसंचरण (Double Circulation) कहते हैं।

मनुष्य का हृदय चार कक्षों वाला होता है। इसलिए एक पूर्ण परिसंचरण के दौरान रक्त दो अलग-अलग मार्गों से होकर गुजरता है।

दोहरा परिसंचरण के दो भाग

  1. फुफ्फुसीय परिसंचरण (Pulmonary Circulation)

इसमें ऑक्सीजन-रहित रक्त हृदय के दाएँ भाग से फेफड़ों में भेजा जाता है। फेफड़ों में रक्त ऑक्सीजन ग्रहण करता है और ऑक्सीजन-युक्त रक्त बनकर हृदय के बाएँ भाग में वापस लौट आता है। 

मार्ग:

हृदय → फेफड़े → हृदय

  1. दैहिक परिसंचरण (Systemic Circulation)

इसमें हृदय का बायाँ भाग ऑक्सीजन-युक्त रक्त को पूरे शरीर में पम्प करता है। शरीर की कोशिकाओं को ऑक्सीजन देने के बाद रक्त ऑक्सीजन-रहित होकर पुनः हृदय के दाएँ भाग में लौट आता है। 

मार्ग:

हृदय → शरीर → हृदय

दोहरा परिसंचरण के लाभ

  • ऑक्सीजन-युक्त एवं ऑक्सीजन-रहित रक्त आपस में नहीं मिलते।
  • शरीर की कोशिकाओं को पर्याप्त ऑक्सीजन प्राप्त होती है।
  • अधिक ऊर्जा (ATP) का उत्पादन होता है।
  • उच्च ऊर्जा की आवश्यकता वाले जीवों (जैसे मनुष्य) में शरीर के अंग अधिक दक्षता से कार्य करते हैं। 

📌 परीक्षा हेतु याद रखें

फुफ्फुसीय परिसंचरण:

हृदय → फेफड़े → हृदय

दैहिक परिसंचरण:

हृदय → शरीर → हृदय 

रक्तचाप (Blood Pressure)

रक्त द्वारा रक्त वाहिनियों की दीवारों पर लगाए गए दबाव को रक्तचाप (Blood Pressure) कहते हैं।

सामान्य रक्तचाप

120/80 mm Hg

120 mm Hg → सिस्टोलिक दाब

80 mm Hg → डायस्टोलिक दाब

रक्तचाप को स्फिग्मोमैनोमीटर (Sphygmomanometer) से मापा जाता है। 

धमनी, शिरा एवं केशिकाएँ

रक्त वाहिनी विशेषता
धमनी (Artery) रक्त को हृदय से शरीर के विभिन्न अंगों तक ले जाती है। इसकी दीवारें मोटी एवं लचीली होती हैं।
शिरा (Vein) रक्त को शरीर से हृदय की ओर लाती है। इनमें कपाट (Valves) पाए जाते हैं।
केशिकाएँ (Capillaries) सबसे पतली रक्त वाहिनियाँ, जहाँ रक्त एवं कोशिकाओं के बीच पदार्थों का आदान-प्रदान होता है।

प्लेटलेट्स एवं रक्त का थक्का

प्लेटलेट्स रक्त कोशिकाएँ हैं, जो रक्त का थक्का (Blood Clot) बनाने में सहायता करती हैं।

चोट लगने पर प्लेटलेट्स रक्तस्राव को रोकने के लिए थक्का बनाती हैं। इससे अधिक रक्त की हानि नहीं होती। 

लसीका (Lymph)

रंगहीन ऊतक द्रव, जो वसा के परिवहन एवं अतिरिक्त द्रव को रक्त में वापस पहुँचाने का कार्य करता है, लसीका (Lymph) कहलाता है।

लसीका में प्रोटीन की मात्रा कम होती है। यह छोटी आँत से अवशोषित वसा का परिवहन करती है तथा ऊतकों से अतिरिक्त द्रव को वापस रक्त में पहुँचाती है। 

पौधों में परिवहन (Transportation in Plants)

पौधों में जल एवं खनिजों का परिवहन जाइलम (Xylem) द्वारा तथा भोजन का परिवहन फ्लोएम (Phloem) द्वारा होता है। 

जाइलम (Xylem)

जाइलम वह संवहनी ऊतक है, जो जड़ों से जल एवं खनिज लवणों का परिवहन पौधे के अन्य भागों तक करता है।

जाइलम मुख्यतः चार प्रकार की कोशिकाओं से मिलकर बना होता है—

जाइलम का भाग जीवित / मृत मुख्य कार्य
ट्रेकिड (Tracheids) मृत (Dead) जल एवं खनिज लवणों का परिवहन
वाहिकाएँ (Vessels) मृत (Dead) जल का तीव्र गति से परिवहन
जाइलम तंतु (Xylem Fibres) मृत (Dead) यांत्रिक दृढ़ता प्रदान करना
जाइलम मृदूतक (Xylem Parenchyma) जीवित (Living) भोजन का संचय तथा जल एवं खनिजों का पार्श्व परिवहन

फ्लोएम (Phloem)

फ्लोएम वह संवहनी ऊतक है, जो पत्तियों में बने भोजन का परिवहन पौधे के अन्य भागों तक करता है।

फ्लोएम मुख्यतः चार प्रकार की कोशिकाओं से मिलकर बना होता है—

फ्लोएम का भाग जीवित / मृत मुख्य कार्य
सीव नलिकाएँ (Sieve Tubes) जीवित (Living) पत्तियों में बने भोजन का पौधे के विभिन्न भागों तक परिवहन करती हैं।
सहचारी कोशिकाएँ (Companion Cells) जीवित (Living) सीव नलिकाओं के कार्य को नियंत्रित एवं सहायता करती हैं।
फ्लोएम मृदूतक (Phloem Parenchyma) जीवित (Living) भोजन का संचय तथा भोजन के पार्श्व (Lateral) परिवहन में सहायता करता है।
फ्लोएम तंतु (Phloem Fibres) मृत (Dead) पौधे को यांत्रिक दृढ़ता (Mechanical Support) प्रदान करते हैं।

वाष्पोत्सर्जन (Transpiration)

पौधों के वायवीय भागों से जल का वाष्प के रूप में निकलना वाष्पोत्सर्जन कहलाता है।

वाष्पोत्सर्जन जड़ों से जल एवं खनिजों के ऊपर की ओर परिवहन में सहायता करता है तथा पौधे का तापमान नियंत्रित रखता है। 

स्थानांतरण (Translocation)

पत्तियों में बने भोजन का फ्लोएम द्वारा पौधे के विभिन्न भागों तक पहुँचाया जाना स्थानांतरण (Translocation) कहलाता है।

यह प्रक्रिया ATP की ऊर्जा की सहायता से होती है। 

उत्सर्जन (Excretion)

शरीर से हानिकारक उपापचयी अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकालने की प्रक्रिया को उत्सर्जन (Excretion) कहते हैं।

मानव उत्सर्जन तंत्र (Human Excretory System)

शरीर से उपापचयी अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकालने वाले अंगों के समूह को मानव उत्सर्जन तंत्र (Human Excretory System) कहते हैं।

मानव उत्सर्जन तंत्र मुख्य रूप से रक्त से यूरिया, अतिरिक्त जल तथा अन्य अपशिष्ट पदार्थों को हटाकर मूत्र के रूप में शरीर से बाहर निकालता है। 

मानव उत्सर्जन तंत्र के प्रमुख अंग

  1. वृक्क (Kidneys)

मनुष्य में दो वृक्क होते हैं, जो उदर गुहा (Abdominal Cavity) में रीढ़ की हड्डी के दोनों ओर स्थित होते हैं। ये रक्त से यूरिया, अतिरिक्त जल एवं अन्य अपशिष्ट पदार्थों को हटाकर मूत्र का निर्माण करते हैं। प्रत्येक वृक्क में लगभग 10 लाख (1 Million) नेफ्रॉन होते हैं, जो वृक्क की संरचनात्मक एवं क्रियात्मक इकाइयाँ हैं तथा मूत्र निर्माण का कार्य करती हैं।

  1. मूत्रवाहिनी (Ureters)

दो पतली पेशीय नलिकाएँ, जो प्रत्येक वृक्क से बने मूत्र को मूत्राशय तक पहुँचाती हैं।

  1. मूत्राशय (Urinary Bladder)

यह एक पेशीय थैली होती है, जिसमें मूत्र कुछ समय के लिए संग्रहित रहता है।

  1. मूत्रमार्ग (Urethra)

यह वह नली है, जिसके द्वारा मूत्राशय में संचित मूत्र शरीर के बाहर निकलता है। 

📌 मूत्र का मार्ग (Flow of Urine)

वृक्क → मूत्रवाहिनी → मूत्राशय → मूत्रमार्ग → शरीर के बाहर

जैव प्रक्रम (Life Processes) अध्याय का मानव उत्सर्जन तंत्र का चित्र, जिसमें वृक्क, वृक्क धमनी, वृक्क शिरा, मूत्रवाहिनी, मूत्राशय तथा मूत्रमार्ग को बड़े हिंदी लेबलों सहित दर्शाया गया है।

चित्र  -मानव उत्सर्जन तंत्र

नेफ्रॉन (Nephron)

वृक्क की संरचनात्मक एवं क्रियात्मक इकाई को नेफ्रॉन (Nephron) कहते हैं।

प्रत्येक वृक्क में लगभग 10 लाख नेफ्रॉन होते हैं। प्रत्येक नेफ्रॉन रक्त का निस्यंदन करके उपयोगी पदार्थों को पुनः अवशोषित करता है तथा शेष अपशिष्ट पदार्थों को मूत्र के रूप में बाहर निकालने में सहायता करता है। 

नेफ्रॉन के प्रमुख भाग

  • बोमैन कैप्सूल (Bowman’s Capsule) – ग्लोमेरुलस को घेरे रहता है तथा निस्यंदन में सहायता करता है।
  • ग्लोमेरुलस (Glomerulus) – केशिकाओं का गुच्छा, जहाँ रक्त का निस्यंदन (Filtration) होता है।
  • निकटस्थ कुंडलित नलिका (Proximal Convoluted Tubule, PCT) – जल, ग्लूकोज़, अमीनो अम्ल एवं लवणों का अधिकांश पुनरवशोषण होता है।
  • हेनले का लूप (Loop of Henle) – जल एवं लवणों के पुनरवशोषण द्वारा मूत्र को सान्द्र बनाने में सहायता करता है।
  • दूरस्थ कुंडलित नलिका (Distal Convoluted Tubule, DCT) – आयनों का स्रवण तथा अतिरिक्त पुनरवशोषण होता है।
  • संग्राहक नलिका (Collecting Duct) – अंतिम मूत्र को एकत्र करके वृक्क पेल्विस की ओर पहुँचाती है।

नेफ्रॉन की कार्य प्रणाली (Working of Nephron)

मूत्र का निर्माण नेफ्रॉन में मुख्यतः तीन चरणों में होता है—

  1. निस्यंदन (Filtration)

ग्लोमेरुलस में उच्च दाब के कारण रक्त का द्रव भाग बोमैन कैप्सूल में छन जाता है। इस निस्यंद में जल, ग्लूकोज़, अमीनो अम्ल, लवण एवं यूरिया होते हैं, जबकि रक्त कोशिकाएँ एवं बड़े प्रोटीन रक्त में ही रह जाते हैं। 

  1. पुनरवशोषण (Reabsorption)

नेफ्रॉन की नलिकाओं में उपयोगी पदार्थ जैसे ग्लूकोज़, अमीनो अम्ल, अधिकांश जल एवं आवश्यक लवण पुनः रक्त में अवशोषित हो जाते हैं। 

  1. नलिकीय स्रवण (Tubular Secretion)

कुछ अतिरिक्त अपशिष्ट पदार्थ एवं आयन (जैसे H⁺, K⁺ तथा अमोनिया) रक्त से नेफ्रॉन की नलिका में स्रावित किए जाते हैं। अंत में बचा हुआ द्रव मूत्र कहलाता है, जो संग्राहक नलिका → वृक्क पेल्विस → मूत्रवाहिनी → मूत्राशय में पहुँच जाता है।

जैव प्रक्रम (Life Processes) अध्याय का NCERT शैली का नेफ्रॉन का विस्तृत चित्र, जिसमें अभिवाही धमनिका, ग्लोमेरुलस, बोमैन कैप्सूल, अपवाही धमनिका, परिनलिकीय केशिकाएँ, प्राक्सन्न कुंडलित नलिका (PCT), हेनले का लूप, पश्च सन्न कुंडलित नलिका (DCT), संग्राहक नलिका तथा रक्त एवं निस्यंद के प्रवाह को स्पष्ट रूप से दर्शाया गया है।

चित्र –नेफ्रॉन की संरचना

डायलिसिस (Dialysis)

जब वृक्क (Kidneys) किसी रोग या क्षति के कारण रक्त को शुद्ध करने में असमर्थ हो जाते हैं, तब कृत्रिम वृक्क (Artificial Kidney) की सहायता से रक्त से अपशिष्ट पदार्थों एवं अतिरिक्त जल को हटाने की प्रक्रिया को डायलिसिस (Dialysis) कहते हैं।

डायलिसिस उन रोगियों के लिए किया जाता है, जिनके वृक्क ठीक प्रकार से कार्य नहीं करते। इसमें कृत्रिम वृक्क रक्त से यूरिया, अतिरिक्त लवण एवं अतिरिक्त जल को हटाकर शुद्ध रक्त को पुनः शरीर में भेजता है। 

डायलिसिस की कार्य प्रणाली (Working of Dialysis)

  • रोगी का रक्त एक नली द्वारा डायलिसिस मशीन तक पहुँचाया जाता है।
  • रक्त डायलाइज़र (Dialyser) से होकर गुजरता है, जिसमें अर्धपारगम्य झिल्ली (Semipermeable Membrane) होती है।
  • इस झिल्ली के माध्यम से यूरिया, अतिरिक्त लवण तथा अतिरिक्त जल डायलिसिस द्रव (Dialysing Fluid) में चले जाते हैं।
  • रक्त कोशिकाएँ एवं आवश्यक प्रोटीन झिल्ली को पार नहीं कर पाते, इसलिए वे रक्त में ही बने रहते हैं।
  • शुद्ध किया गया रक्त पुनः रोगी के शरीर में पहुँचा दिया जाता है।

पौधों में उत्सर्जन

पौधे अपशिष्ट पदार्थों को विभिन्न तरीकों से बाहर निकालते हैं—

  • रंध्रों द्वारा गैसों का उत्सर्जनहदष
  • वाष्पोत्सर्जन द्वारा अतिरिक्त जल का निष्कासन
  • गोंद, राल एवं लेटेक्स के रूप में अपशिष्ट का संचय
  • पुराने पत्तों एवं छाल के गिरने द्वारा अपशिष्ट का निष्कासन

✅ महत्वपूर्ण तथ्य (Important Facts)

  1. जीवन को बनाए रखने वाली आवश्यक क्रियाओं को जैव प्रक्रम (Life Processes) कहते हैं।
  2. हरे पौधे स्वपोषी (Autotrophs) तथा जन्तु विषमपोषी (Heterotrophs) होते हैं।
  3. प्रकाश संश्लेषण के लिए क्लोरोफिल, सूर्य का प्रकाश, कार्बन डाइऑक्साइड एवं जल आवश्यक हैं।
  4. प्रकाश संश्लेषण के दौरान ऑक्सीजन उप-उत्पाद (By-product) के रूप में मुक्त होती है।
  5. रंध्र (Stomata) गैसों के आदान-प्रदान एवं वाष्पोत्सर्जन में सहायता करते हैं।
  6. मनुष्य में कार्बोहाइड्रेट का पाचन मुख से प्रारम्भ होता है।
  7. पित्त रस (Bile Juice) कोई एंजाइम नहीं है, यह वसा का इमल्सीकरण करता है।
  8. छोटी आँत पाचन एवं अवशोषण का प्रमुख स्थान है।
  9. ATP (Adenosine Triphosphate) कोशिका की ऊर्जा मुद्रा (Energy Currency) कहलाती है।
  10. हीमोग्लोबिन ऑक्सीजन के परिवहन का कार्य करता है।
  11. मनुष्य में द्विगुण परिसंचरण (Double Circulation) पाया जाता है।
  12. सामान्य रक्तचाप 120/80 mm Hg होता है।
  13. जाइलम जल एवं खनिज लवणों का तथा फ्लोएम भोजन का परिवहन करता है।
  14. नेफ्रॉन वृक्क की संरचनात्मक एवं क्रियात्मक इकाई है।
  15. मूत्र निर्माण के तीन चरण हैं— निस्यंदन, पुनरवशोषण एवं नलिकीय स्रवण
  16. वृक्क के कार्य न करने पर डायलिसिस द्वारा रक्त शुद्ध किया जाता है।
  17. पौधे रंध्र, पुराने पत्तों, गोंद एवं राल द्वारा अपशिष्ट पदार्थ बाहर निकालते हैं।

📝 सभी महत्वपूर्ण जैविक समीकरण एवं सूत्र

प्रक्रिया समीकरण / सूत्र
प्रकाश संश्लेषण 6CO₂ + 12H₂O → C₆H₁₂O₆ + 6O₂ + 6H₂O
(सूर्य का प्रकाश, क्लोरोफिल)
एरोबिक श्वसन C₆H₁₂O₆ + 6O₂ → 6CO₂ + 6H₂O + ऊर्जा (ATP)
एनेरोबिक श्वसन (यीस्ट) C₆H₁₂O₆ → 2C₂H₅OH + 2CO₂ + ऊर्जा
एनेरोबिक श्वसन (मांसपेशियाँ) C₆H₁₂O₆ → 2C₃H₆O₃ + ऊर्जा
सामान्य रक्तचाप 120/80 mm Hg

❓FAQs (CBSE Board PYQs)

1. जैव प्रक्रम क्या हैं?

जीवित रहने के लिए आवश्यक सभी अनुरक्षण क्रियाओं को जैव प्रक्रम कहते हैं।

2. जीवन के चार प्रमुख जैव प्रक्रम कौन-से हैं?

पोषण, श्वसन, परिवहन एवं उत्सर्जन।

3. प्रकाश संश्लेषण क्या है?

वह प्रक्रिया जिसमें हरे पौधे सूर्य के प्रकाश एवं क्लोरोफिल की उपस्थिति में भोजन बनाते हैं।

4. रंध्र (Stomata) का क्या कार्य है?

गैसों का आदान-प्रदान एवं वाष्पोत्सर्जन।

5. पित्त रस का मुख्य कार्य क्या है?

वसा का इमल्सीकरण करना।

6. छोटी आँत का मुख्य कार्य क्या है?

भोजन का पूर्ण पाचन एवं अवशोषण।

7. ATP को ऊर्जा मुद्रा क्यों कहते हैं?

क्योंकि कोशिका में ऊर्जा ATP के रूप में संग्रहित एवं उपयोग होती है।

8. एरोबिक एवं एनेरोबिक श्वसन में अंतर लिखिए।

एरोबिक श्वसन ऑक्सीजन की उपस्थिति में तथा एनेरोबिक श्वसन ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में होता है।

9. एल्विओलाई का क्या कार्य है?

ऑक्सीजन एवं कार्बन डाइऑक्साइड का आदान-प्रदान।

10. हीमोग्लोबिन का कार्य क्या है?

ऑक्सीजन का परिवहन।

11. दोहरा परिसंचरण क्या है?

एक पूर्ण परिसंचरण में रक्त का हृदय से दो बार होकर गुजरना।

12. जाइलम एवं फ्लोएम का कार्य लिखिए।

जाइलम जल एवं खनिजों का तथा फ्लोएम भोजन का परिवहन करता है।

13. नेफ्रॉन क्या है?

वृक्क की संरचनात्मक एवं क्रियात्मक इकाई।

14. मूत्र निर्माण के तीन चरण कौन-से हैं?

निस्यंदन, पुनरवशोषण एवं नलिकीय स्रवण।

15. डायलिसिस क्या है?

कृत्रिम वृक्क द्वारा रक्त शुद्ध करने की प्रक्रिया।

🎯 प्रतियोगी परीक्षा टिप्स

  • ATP = Energy Currency हमेशा याद रखें।
  • पित्त रस एंजाइम नहीं है।
  • जाइलम → जल, फ्लोएम → भोजन (सबसे अधिक पूछा जाने वाला प्रश्न)
  • नेफ्रॉन = Kidney की Structural & Functional Unit
  • Right Heart = Deoxygenated Blood, Left Heart = Oxygenated Blood
  • RBC = हीमोग्लोबिन, WBC = प्रतिरक्षा, Platelets = रक्त का थक्का
  • फुफ्फुसीय धमनी ऑक्सीजन-रहित रक्त ले जाती है, जबकि फुफ्फुसीय शिरा ऑक्सीजन-युक्त रक्त लाती है।
  • सामान्य रक्तचाप = 120/80 mm Hg
  • वृक्क → मूत्रवाहिनी → मूत्राशय → मूत्रमार्ग
  • मूत्र निर्माण = Filtration → Reabsorption → Tubular Secretion

🏁 निष्कर्ष

जैव प्रक्रम (Life Processes) वे सभी आवश्यक क्रियाएँ हैं जो किसी जीव को जीवित बनाए रखती हैं। पोषण से शरीर को ऊर्जा एवं आवश्यक पदार्थ प्राप्त होते हैं, श्वसन द्वारा भोजन से ऊर्जा (ATP) बनती है, परिवहन तंत्र ऑक्सीजन, भोजन एवं हार्मोन को शरीर के विभिन्न भागों तक पहुँचाता है तथा उत्सर्जन तंत्र अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकालकर शरीर का आंतरिक संतुलन बनाए रखता है। इन सभी जैव प्रक्रमों की समुचित समझ न केवल बोर्ड परीक्षा बल्कि NEET, CUET एवं अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।

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