आनुवंशिकी (Genetics)
📘 परिचय – आनुवंशिकी (Genetics) जीव विज्ञान की वह शाखा है जिसमें आनुवंशिकता (Heredity) और विविधता (Variation) का अध्ययन किया जाता है। आनुवंशिकता के कारण माता-पिता के कई लक्षण संतानों में दिखाई देते हैं, जबकि विविधता के कारण एक ही प्रजाति के सदस्यों में कुछ अंतर पाए जाते हैं।
आनुवंशिक सूचना का प्रमुख आधार DNA (Deoxyribonucleic Acid) है। DNA में उपस्थित विशिष्ट अनुक्रम जीन (Gene) कहलाते हैं। जीन जीव के विभिन्न लक्षणों और कोशिकीय कार्यों से संबंधित आनुवंशिक सूचना रखते हैं। DNA विशेष प्रोटीनों के साथ मिलकर गुणसूत्र (Chromosome) बनाता है।
आनुवंशिकी को समझने के लिए DNA, RNA, जीन, गुणसूत्र और आनुवंशिकता के नियमों के बीच संबंध समझना आवश्यक है। इसी आधार पर वैज्ञानिक यह समझते हैं कि आनुवंशिक सूचना कैसे संग्रहीत होती है, अभिव्यक्त होती है और पीढ़ियों तक पहुँचती है।
📚 विषय सूची
- आनुवंशिकी (Genetics)
- DNA (डीऑक्सीराइबोन्यूक्लिक अम्ल)
- DNA की संरचना
- DNA की द्विकुंडली संरचना
- RNA (राइबोन्यूक्लिक अम्ल)
- जीन (Gene)
- गुणसूत्र (Chromosome)
- मेंडल के नियम (Mendel’s Laws)
- उत्परिवर्तन (Mutation)
- आनुवंशिक रोग (Genetic Disorders)
- महत्वपूर्ण तथ्य
- FAQs
- प्रतियोगी परीक्षा टिप्स
- निष्कर्ष
- अभ्यास प्रश्न
🧬 आनुवंशिकी (Genetics)
आनुवंशिकता वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा आनुवंशिक लक्षण माता-पिता से संतानों तक पहुँचते हैं। इसके विपरीत, विविधता एक ही प्रजाति के जीवों में पाए जाने वाले आनुवंशिक या अन्य अंतर को दर्शाती है।
आनुवंशिकी के अध्ययन में Gregor Johann Mendel का विशेष योगदान है। मटर के पौधों पर उनके प्रयोगों ने यह समझने की आधारशिला रखी कि लक्षण किस प्रकार एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में स्थानांतरित होते हैं। इसी कारण उन्हें आनुवंशिकी का जनक (Father of Genetics) कहा जाता है।
आनुवंशिकता की मूल इकाई के रूप में जीन को समझना महत्वपूर्ण है, जबकि DNA वह अणु है जिसमें जीन की आनुवंशिक सूचना संग्रहीत रहती है।
🧬 DNA (Deoxyribonucleic Acid)
DNA (डीऑक्सीराइबोन्यूक्लिक अम्ल) अधिकांश जीवों में आनुवंशिक सूचना का प्रमुख वाहक है। यूकैरियोटिक कोशिकाओं में DNA मुख्यतः नाभिक (Nucleus) में गुणसूत्रों के रूप में पाया जाता है। इसके अतिरिक्त माइटोकॉन्ड्रिया और पौधों के हरितलवक में भी अपना DNA पाया जाता है।
DNA की मूल संरचनात्मक इकाई न्यूक्लियोटाइड (Nucleotide) है।
प्रत्येक न्यूक्लियोटाइड में तीन प्रमुख घटक होते हैं:
- डीऑक्सीराइबोज शर्करा (Deoxyribose Sugar)
- फॉस्फेट समूह (Phosphate Group)
- नाइट्रोजनी क्षारक (Nitrogenous Base)
DNA में चार प्रमुख नाइट्रोजनी क्षारक पाए जाते हैं:
- एडेनिन (Adenine, A)
- थाइमिन (Thymine, T)
- ग्वानिन (Guanine, G)
- साइटोसिन (Cytosine, C)
इन क्षारकों का क्रम DNA में आनुवंशिक सूचना को निर्धारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
🧬 DNA की संरचना (Structure of DNA)
DNA सामान्यतः दो पॉलीन्यूक्लियोटाइड शृंखलाओं से बना होता है। दोनों शृंखलाएँ एक-दूसरे के चारों ओर मुड़कर द्विकुंडली (Double Helix) संरचना बनाती हैं।
DNA की दोनों शृंखलाओं के नाइट्रोजनी क्षारक आपस में पूरक क्षार युग्म (Complementary Base Pairs) बनाते हैं:
A — T
G — C
एडेनिन और थाइमिन के बीच 2 हाइड्रोजन बंध, जबकि ग्वानिन और साइटोसिन के बीच 3 हाइड्रोजन बंध होते हैं।
DNA की दोनों शृंखलाएँ प्रतिसमानांतर (Antiparallel) होती हैं। इसका अर्थ है कि एक शृंखला की दिशा 5′ → 3′ होती है, जबकि दूसरी की दिशा 3′ → 5′ होती है।
🔬 DNA की द्विकुंडली संरचना (Double Helical Structure)
DNA की द्विकुंडली संरचना का मॉडल James Watson और Francis Crick ने 1953 में प्रस्तुत किया था। इस मॉडल ने DNA की संरचना और आनुवंशिक सूचना के संगठन को समझने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
DNA की संरचना से संबंधित महत्वपूर्ण X-ray diffraction अध्ययन Rosalind Franklin और Maurice Wilkins के कार्य से प्राप्त हुए थे। विशेष रूप से Rosalind Franklin के DNA संबंधी X-ray diffraction data ने DNA की helical संरचना को समझने में महत्वपूर्ण वैज्ञानिक प्रमाण प्रदान किए।
DNA की द्विकुंडली संरचना में:
- दो पॉलीन्यूक्लियोटाइड शृंखलाएँ होती हैं।
- दोनों शृंखलाएँ एक-दूसरे के चारों ओर कुंडलित होती हैं।
- शर्करा और फॉस्फेट की रीढ़ बाहर की ओर होती है।
- नाइट्रोजनी क्षारक अंदर की ओर स्थित होते हैं।
- पूरक क्षारों के बीच हाइड्रोजन बंध पाए जाते हैं।
- दोनों शृंखलाएँ प्रतिसमानांतर होती हैं।
DNA की सामान्य B-DNA संरचना में एक पूर्ण कुंडली (Turn) में लगभग 10 base pairs होते हैं और एक turn की लंबाई लगभग 3.4 nm होती है।
पूरक क्षारों का यह क्रम DNA की प्रतिकृति (Replication) और आनुवंशिक सूचना के संरक्षण के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
🧬 DNA की पूरकता (Complementarity)
DNA में क्षारों की पूरकता का नियम बहुत महत्वपूर्ण है:
A ↔ T
G ↔ C
उदाहरण के लिए, यदि DNA की एक शृंखला है:
5′–ATGC–3′
तो उसकी पूरक शृंखला होगी:
3′–TACG–5′
यही पूरकता DNA की प्रतिकृति के दौरान नई शृंखला बनाने में आधार प्रदान करती है।
चित्र – DNA की द्विकुंडली संरचना
🔄 DNA की प्रतिकृति (DNA Replication)
DNA की अपनी जैसी नई DNA शृंखला बनाने की प्रक्रिया को DNA प्रतिकृति (DNA Replication) कहते हैं। यह प्रक्रिया कोशिका विभाजन से पहले आनुवंशिक सूचना की प्रतिलिपि तैयार करने के लिए आवश्यक है।
DNA की दोनों शृंखलाएँ एक-दूसरे की पूरक (Complementary) होती हैं। इसलिए प्रत्येक पुरानी शृंखला नई शृंखला के निर्माण के लिए Template का कार्य कर सकती है।
DNA प्रतिकृति को अर्ध-संरक्षी प्रतिकृति (Semiconservative Replication) कहा जाता है, क्योंकि बनने वाले प्रत्येक नए DNA अणु में:
- एक पुरानी शृंखला होती है।
- एक नई बनी हुई शृंखला होती है।
🧪 DNA प्रतिकृति के प्रमुख चरण
- DNA का खुलना:
Helicase एंजाइम DNA की दोनों शृंखलाओं को अलग करता है।
- नई शृंखला का निर्माण:
- DNA Polymerase पुरानी शृंखला को template मानकर complementary nucleotides जोड़ता है।
- A के सामने T तथा G के सामने C जुड़ता है।
सरल रूप में:
- पुराना DNA → शृंखलाएँ अलग → Complementary nucleotides जुड़ते हैं → दो DNA molecules
- DNA Polymerase नई शृंखला का निर्माण सामान्यतः 5′ → 3′ दिशा में करता है।
🧬 DNA प्रतिकृति का महत्व
DNA प्रतिकृति के कारण कोशिका विभाजन के बाद बनने वाली नई कोशिकाओं को आनुवंशिक सूचना की प्रतिलिपि प्राप्त होती है।
इसलिए यह:
- कोशिका विभाजन के लिए आवश्यक है।
- आनुवंशिक सूचना के संरक्षण में सहायता करती है।
- संतति कोशिकाओं में DNA के स्थानांतरण का आधार है।
DNA की प्रतिकृति में होने वाली त्रुटियों को कोशिकीय DNA Repair Mechanisms द्वारा कई स्थितियों में सुधारा जा सकता है।
🧬 RNA (Ribonucleic Acid)
RNA (राइबोन्यूक्लिक अम्ल) एक महत्वपूर्ण न्यूक्लिक अम्ल है जो जीन की आनुवंशिक सूचना के उपयोग और प्रोटीन संश्लेषण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
RNA की संरचनात्मक इकाई भी न्यूक्लियोटाइड (Nucleotide) है। इसके प्रत्येक न्यूक्लियोटाइड में:
- राइबोज शर्करा (Ribose Sugar)
- फॉस्फेट समूह (Phosphate Group)
- नाइट्रोजनी क्षारक (Nitrogenous Base)
होते हैं।
RNA में चार प्रमुख नाइट्रोजनी क्षारक होते हैं:
- एडेनिन (Adenine, A)
- यूरैसिल (Uracil, U)
- ग्वानिन (Guanine, G)
- साइटोसिन (Cytosine, C)
RNA में Thymine के स्थान पर Uracil पाया जाता है।
🧬 DNA और RNA में अंतर
| आधार | DNA | RNA |
|---|---|---|
| पूरा नाम | Deoxyribonucleic Acid | Ribonucleic Acid |
| शर्करा | Deoxyribose | Ribose |
| प्रमुख विशिष्ट क्षार | Thymine | Uracil |
| सामान्य संरचना | द्विशृंखली | सामान्यतः एकशृंखली |
| प्रमुख भूमिका | आनुवंशिक सूचना का संग्रह | सूचना के उपयोग और प्रोटीन संश्लेषण में भूमिका |
NOTE – RNA सामान्यतः एकशृंखली होता है, लेकिन कुछ RNA अणु अपने अंदर complementary base pairing के कारण जटिल द्वितीयक संरचनाएँ बना सकते हैं।
🧬 RNA के प्रमुख प्रकार
प्रोटीन संश्लेषण में तीन प्रमुख प्रकार के RNA विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं:
- संदेशवाहक RNA (mRNA)
- mRNA (Messenger RNA) DNA में उपस्थित आनुवंशिक सूचना को राइबोसोम तक पहुँचाने का कार्य करता है।
- इसमें उपस्थित Codons प्रोटीन में अमीनो अम्लों के क्रम के लिए सूचना प्रदान करते हैं।
सरल क्रम:
DNA → mRNA → Ribosome
- स्थानांतरण RNA (tRNA)
- tRNA (Transfer RNA) अमीनो अम्लों को राइबोसोम तक पहुँचाने में सहायता करता है।
- tRNA पर उपस्थित Anticodon, mRNA के संबंधित codon के साथ complementary base pairing करता है।
इस प्रकार tRNA सही अमीनो अम्ल को प्रोटीन निर्माण के स्थान तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
- राइबोसोमल RNA (rRNA)
rRNA (Ribosomal RNA) राइबोसोम का प्रमुख RNA घटक है। यह राइबोसोम की संरचना और प्रोटीन संश्लेषण की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
NOTE –
- mRNA → संदेश
- tRNA → अमीनो अम्ल का परिवहन
- rRNA → राइबोसोम का प्रमुख घटक
🧬 RNA का महत्व
RNA आनुवंशिक सूचना को सीधे उपयोगी जैविक कार्यों से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
विशेष रूप से:
DNA → RNA → Protein
यह क्रम आनुवंशिक सूचना के प्रवाह को समझने का मूल आधार है। DNA में संग्रहीत सूचना का RNA में प्रतिलेखन होता है और इसके बाद RNA की सूचना के आधार पर प्रोटीन का निर्माण होता है।
इन प्रक्रियाओं का विस्तृत अध्ययन अगले भाग में प्रतिलेखन (Transcription) और अनुवादन (Translation) के अंतर्गत किया जाएगा।
🧬 जीन (Gene)
जीन (Gene) DNA का एक विशिष्ट अनुक्रम है, जिसमें किसी कार्यात्मक उत्पाद के निर्माण या किसी जैविक कार्य से संबंधित आनुवंशिक सूचना होती है। जीन आनुवंशिकता की मूल इकाइयों में से एक है।
किसी जीन की DNA sequence में परिवर्तन होने पर उसके कार्य या उससे संबंधित उत्पाद में परिवर्तन हो सकता है। इसी कारण जीन का अध्ययन आनुवंशिक लक्षणों और आनुवंशिक रोगों को समझने में महत्वपूर्ण है।
सरल संबंध:
DNA → जीन → आनुवंशिक सूचना
जीन गुणसूत्रों पर विशेष स्थान पर स्थित होते हैं, जिसे जीन स्थान (Locus) कहा जाता है।
🧬 जीन अभिव्यक्ति (Gene Expression)
DNA में संग्रहीत सूचना तभी उपयोगी होती है जब कोशिका उसे पढ़कर आवश्यक RNA या प्रोटीन का निर्माण करती है। इस प्रक्रिया को व्यापक रूप से जीन अभिव्यक्ति (Gene Expression) कहा जाता है।
प्रोटीन बनाने वाले जीन के लिए आनुवंशिक सूचना का सामान्य प्रवाह इस प्रकार समझा जाता है:
DNA → RNA → Protein
इसमें DNA की सूचना से RNA बनने को प्रतिलेखन (Transcription) और RNA की सूचना के आधार पर प्रोटीन बनने को अनुवादन (Translation) कहते हैं।
🧬 प्रतिलेखन (Transcription)
- DNA की किसी विशेष शृंखला की सूचना के आधार पर RNA बनने की प्रक्रिया को प्रतिलेखन (Transcription) कहते हैं।
- यूकैरियोटिक कोशिकाओं में प्रतिलेखन मुख्यतः नाभिक (Nucleus) में होता है।
- इस प्रक्रिया में RNA Polymerase एंजाइम महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
सरल क्रम
DNA Template → RNA Polymerase → RNA
DNA की template strand को आधार बनाकर RNA में complementary nucleotides जोड़े जाते हैं।
RNA में:
A → U
और
G → C
का complementary pairing हो सकता है।
प्रतिलेखन के परिणामस्वरूप बनने वाला RNA आगे कोशिका की आवश्यकता के अनुसार कार्य करता है।
🧬 अनुवादन (Translation)
- mRNA में उपस्थित आनुवंशिक सूचना के आधार पर अमीनो अम्लों की श्रृंखला (Polypeptide) बनने की प्रक्रिया को अनुवादन (Translation) कहते हैं।
- यह प्रक्रिया राइबोसोम (Ribosome) पर होती है।
- mRNA पर तीन-तीन न्यूक्लियोटाइड का समूह कोडॉन (Codon) कहलाता है। प्रत्येक codon किसी अमीनो अम्ल या translation के प्रारंभ अथवा समाप्ति का संकेत दे सकता है।
- tRNA अपने Anticodon की सहायता से संबंधित codon को पहचानता है और उपयुक्त amino acid को राइबोसोम तक पहुँचाता है।
सरल क्रम:
mRNA → Codon → tRNA → Amino Acids → Polypeptide
🧬 आनुवंशिक कूट (Genetic Code)
mRNA में न्यूक्लियोटाइडों के तीन-तीन के समूह को कोडॉन (Codon) कहते हैं। ये codons यह निर्धारित करते हैं कि प्रोटीन निर्माण के दौरान अमीनो अम्ल किस क्रम में जुड़ेंगे।
आनुवंशिक कूट की प्रमुख विशेषताएँ:
- एक codon में 3 nucleotides होते हैं।
- कुल 64 codons होते हैं।
- इनमें 61 codons amino acids के लिए संकेत करते हैं।
- 3 codons — UAA, UAG और UGA stop codons हैं।
- AUG सामान्यतः start codon है और Methionine के लिए संकेत करता है।
- आनुवंशिक कूट को सामान्यतः Degenerate कहा जाता है क्योंकि एक amino acid के लिए एक से अधिक codons हो सकते हैं।
- सामान्यतः एक codon एक ही amino acid या संकेत से संबंधित होता है।
🧬 प्रोटीन संश्लेषण (Protein Synthesis)
प्रोटीन संश्लेषण में DNA की आनुवंशिक सूचना अंततः amino acids के क्रम में परिवर्तित होती है।
मुख्य चरण:
DNA
↓ प्रतिलेखन
mRNA
↓ अनुवादन
Polypeptide
↓
Functional Protein
प्रोटीन कोशिका में संरचनात्मक, एंजाइमीय, परिवहन और अन्य अनेक कार्य कर सकते हैं।
चित्र – जीन अभिव्यक्ति का प्रवाह
🧬 जीन, DNA और प्रोटीन का संबंध
इन तीनों को एक साथ समझना बहुत महत्वपूर्ण है:
- DNA → आनुवंशिक सूचना का प्रमुख भंडार
- जीन → DNA का विशिष्ट आनुवंशिक अनुक्रम
- RNA → आनुवंशिक सूचना के उपयोग में महत्वपूर्ण मध्यस्थ
- प्रोटीन → कई जैविक संरचनाओं और कार्यों का प्रमुख आधार
इस प्रकार किसी जीन में उपस्थित सूचना उसके संबंधित RNA या protein product के निर्माण को प्रभावित कर सकती है और अंततः किसी लक्षण की अभिव्यक्ति में योगदान दे सकती है।
🧬 जीन और एलील (Gene and Allele)
किसी जीन के वैकल्पिक रूपों को एलील (Allele) कहते हैं।
उदाहरण के लिए, किसी विशेष लक्षण से संबंधित जीन के दो अलग-अलग alleles हो सकते हैं। किसी व्यक्ति को किसी जीन का एक allele माता से और दूसरा पिता से प्राप्त हो सकता है।
- यदि दोनों alleles समान हों, तो अवस्था समयुग्मजी (Homozygous) कहलाती है। उदाहरण: TT या tt
- यदि दोनों alleles अलग हों, तो अवस्था विषमयुग्मजी (Heterozygous) कहलाती है। उदाहरण: Tt
इन्हीं अवधारणाओं का उपयोग आगे मेंडल के नियमों और वंशागति (Inheritance) को समझने में किया जाएगा।
🧬 गुणसूत्र (Chromosome)
गुणसूत्र (Chromosome) कोशिका के नाभिक में पाया जाने वाला DNA और प्रोटीन से बना संरचनात्मक घटक है। इसमें जीन व्यवस्थित रूप से स्थित होते हैं और यह आनुवंशिक सूचना के संरक्षण तथा कोशिका विभाजन के दौरान उसके वितरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
मानव की सामान्य देह कोशिकाओं (Somatic Cells) में 46 गुणसूत्र, अर्थात् 23 जोड़े पाए जाते हैं। इनमें:
- 22 जोड़े स्वसूत्र (Autosomes) एवं 1 जोड़ा लैंगिक गुणसूत्र (Sex Chromosomes) होता है।
- मानव में सामान्यतः महिलाओं का लैंगिक गुणसूत्र संयोजन XX और पुरुषों का XY होता है।
🧬 गुणसूत्र की संरचना (Structure of Chromosome)
- कोशिका विभाजन के समय गुणसूत्र अधिक संघनित और स्पष्ट दिखाई देते हैं। गुणसूत्र के प्रमुख भागों में क्रोमैटिड (Chromatid) और सेंट्रोमियर (Centromere) शामिल हैं।
- DNA विशेष प्रोटीनों, मुख्यतः हिस्टोन (Histone), के साथ मिलकर अधिक व्यवस्थित संरचना बनाता है।
सरल क्रम:
DNA → Histone के साथ संगठन → Chromatin → Chromosome
गुणसूत्र पर जीन विशेष स्थानों पर स्थित होते हैं। जीन के इस निश्चित स्थान को जीन स्थान (Locus) कहा जाता है।
🌱 मेंडल और उनके प्रयोग (Mendel and His Experiments)
ग्रेगर जॉन मेंडल (Gregor Johann Mendel) ने मटर के पौधों (Pisum sativum) पर नियंत्रित संकरण प्रयोग किए। उनके प्रयोगों ने यह समझने में महत्वपूर्ण आधार दिया कि लक्षण पीढ़ियों में किस प्रकार संचरित होते हैं।
उन्होंने ऐसे लक्षणों का चयन किया जिनके विपरीत रूप स्पष्ट रूप से पहचाने जा सकते थे।
उदाहरण:
लंबा पौधा ↔ बौना पौधा
मेंडल के कार्य से प्रभाविता, पृथक्करण और स्वतंत्र वर्गीकरण जैसे प्रमुख आनुवंशिक सिद्धांतों को समझने का आधार मिला।
🧬 प्रभाविता का नियम (Law of Dominance)
जब किसी जीव में किसी जीन के दो अलग-अलग एलील उपस्थित हों और उनमें से एक एलील का लक्षण phenotype में दिखाई दे, तो उस एलील को प्रभावी (Dominant) कहा जाता है।
दूसरे एलील का लक्षण उस अवस्था में दिखाई नहीं देता, तो उसे अप्रभावी (Recessive) कहा जाता है।
उदाहरण:
- T = लंबा
- t = बौना
यदि genotype Tt है, तो सामान्य Mendelian स्थिति में phenotype लंबा होगा।
🧬 पृथक्करण का नियम (Law of Segregation)
किसी जीन के दोनों एलील युग्मक निर्माण के दौरान एक-दूसरे से अलग हो जाते हैं। प्रत्येक युग्मक को उस जीन का केवल एक एलील प्राप्त होता है।
इसी कारण इसे एलील के पृथक्करण का नियम (Law of Segregation) कहा जाता है।
उदाहरण:
Tt → T + t
अर्थात् T और t अलग-अलग युग्मकों में चले जाते हैं।
निषेचन के समय दो युग्मकों के मिलने से फिर से allele pair बनता है।
🧬 एकसंकर संकरण (Monohybrid Cross)
जब किसी एक जोड़ी विपरीत लक्षणों का अध्ययन करने के लिए संकरण किया जाता है, तो उसे एकसंकर संकरण (Monohybrid Cross) कहते हैं।
उदाहरण:
TT × tt
पहली संतति:
F₁ → सभी Tt
सामान्य प्रभावी-अप्रभावी स्थिति में सभी F₁ पौधे लंबे होंगे।
जब F₁ का आपस में संकरण कराया जाता है:
Tt × Tt
तो F₂ में:
फीनोटाइप रेशियो- TT : Tt : tt = 1 : 2 : 1
और सामान्य phenotype ratio:
लंबा : बौना = 3 : 1
🧬 स्वतंत्र वर्गीकरण का नियम (Law of Independent Assortment)
जब दो या दो से अधिक जीन युग्मों (Gene Pairs) के एलील (Alleles) युग्मक (Gamete) निर्माण के समय एक-दूसरे से स्वतंत्र रूप से अलग और संयोजित होते हैं, तो इसे स्वतंत्र वर्गीकरण का नियम (Law of Independent Assortment) कहते हैं।
यह नियम विशेष रूप से उन जीनों के लिए लागू होता है जो अलग-अलग गुणसूत्रों (Different Chromosomes) पर स्थित हों या meiosis में पर्याप्त स्वतंत्रता से assort करें।
🧬 द्विसंकर संकरण (Dihybrid Cross)
- R = गोल बीज (Round)
- r = झुर्रीदार बीज (Wrinkled)
- Y = पीले बीज (Yellow)
- y = हरे बीज (Green)
P पीढ़ी (Parent Generation)
RRYY × rryy
गोल, पीले × झुर्रीदार, हरे
F₁ पीढ़ी
सभी संतति: RrYy → गोल, पीले
F₁ से बनने वाले युग्मक:
RY, Ry, rY, ry
F₁ का स्वसंकरण
RrYy × RrYy
F₂ में संभावित Genotypes:
RRYY, RRYy, RRyy, RrYY, RrYy, Rryy, rrYY, rrYy, rryy
इनका सामान्य जीनोटाइपी अनुपात (Genotypic Ratio):
1 : 2 : 1 : 2 : 4 : 2 : 1 : 2 : 1
और
लक्षणप्ररूपी अनुपात (Phenotypic Ratio):
9 : 3 : 3 : 1
अर्थात्:
9 गोल-पीले : 3 गोल-हरे : 3 झुर्रीदार-पीले : 1 झुर्रीदार-हरा
यही 9 : 3 : 3 : 1 अनुपात स्वतंत्र वर्गीकरण के नियम का सबसे प्रसिद्ध Mendelian परिणाम है।
चित्र – द्विसंकर संकरण का Checkerboard
🧬 जीनोटाइप और फीनोटाइप (Genotype and Phenotype)
जीनोटाइप (Genotype)
किसी जीव की आनुवंशिक संरचना या किसी विशेष लक्षण से संबंधित उसके alleles के संयोजन को genotype कहते हैं।
उदाहरण: TT, Tt, tt
फीनोटाइप (Phenotype)
किसी जीव में दिखाई देने वाले या मापे जा सकने वाले लक्षण को phenotype कहते हैं।
उदाहरण: लंबा पौधा, बौना पौधा
इस प्रकार:
Genotype → आनुवंशिक संरचना
Phenotype → दिखाई देने वाला लक्षण
🧬 उत्परिवर्तन (Mutation)
DNA के न्यूक्लियोटाइड अनुक्रम में होने वाला स्थायी आनुवंशिक परिवर्तन उत्परिवर्तन (Mutation) कहलाता है। यह परिवर्तन किसी जीन के छोटे भाग से लेकर पूरे गुणसूत्र की संरचना या संख्या तक में हो सकता है।
उत्परिवर्तन का प्रभाव हमेशा समान नहीं होता। यह हानिकारक (Harmful), लाभकारी (Beneficial) या तटस्थ (Neutral) हो सकता है। उत्परिवर्तन आनुवंशिक विविधता का एक महत्वपूर्ण स्रोत है।
🧬 जीन उत्परिवर्तन (Gene Mutation)
किसी जीन के DNA अनुक्रम में होने वाले परिवर्तन को जीन उत्परिवर्तन (Gene Mutation) कहते हैं।
इसके प्रमुख प्रकार हैं:
1.प्रतिस्थापन (Substitution)
जब DNA में एक न्यूक्लियोटाइड या क्षार-युग्म के स्थान पर दूसरा आ जाता है, तो इसे प्रतिस्थापन (Substitution) कहते हैं।
2.विलोपन (Deletion)
जब DNA अनुक्रम से एक या अधिक न्यूक्लियोटाइड हट जाते हैं, तो इसे विलोपन (Deletion) कहते हैं।
3.प्रवेशन/सम्मिलन (Insertion)
जब DNA अनुक्रम में एक या अधिक न्यूक्लियोटाइड जुड़ जाते हैं, तो इसे प्रवेशन (Insertion) कहते हैं।
नोट – यदि विलोपन या प्रवेशन तीन के गुणज में नहीं होता, तो आगे पढ़े जाने वाले न्यूक्लियोटाइडों का क्रम बदल सकता है। इसे पठन-फ्रेम परिवर्तन (Frameshift Mutation) कहते हैं।
🧬 गुणसूत्रीय उत्परिवर्तन (Chromosomal Mutation)
गुणसूत्र की संरचना में होने वाले परिवर्तन को गुणसूत्रीय उत्परिवर्तन (Chromosomal Mutation) कहा जाता है।
इसके प्रमुख प्रकार हैं:
- विलोपन (Deletion) — गुणसूत्र का कोई भाग हट जाना।
- द्विगुणन (Duplication) — किसी गुणसूत्रीय भाग की अतिरिक्त प्रति बनना।
- उलटाव (Inversion) — गुणसूत्र का कोई भाग उलटकर पुनः जुड़ जाना।
- स्थानांतरण (Translocation) — गुणसूत्र का कोई भाग दूसरे गुणसूत्र में स्थानांतरित होना।
🧬 गुणसूत्र संख्या में परिवर्तन
गुणसूत्रों की संख्या में असामान्यता को संख्यात्मक गुणसूत्रीय परिवर्तन के रूप में समझा जाता है।
असुगुणितता (Aneuploidy)
जब एक या कुछ गुणसूत्रों की संख्या सामान्य संख्या से कम या अधिक हो जाती है, तो इसे असुगुणितता (Aneuploidy) कहते हैं।
इसके दो प्रमुख रूप हैं:
- एकसूत्रता (Monosomy) → किसी गुणसूत्र की एक प्रति का अभाव।
- त्रिसूत्रता (Trisomy) → किसी गुणसूत्र की दो के स्थान पर तीन प्रतियाँ होना।
उदाहरण के लिए, डाउन सिंड्रोम (Down Syndrome) सामान्यतः गुणसूत्र 21 की अतिरिक्त प्रति अर्थात् त्रिसूत्रता 21 (Trisomy 21) से संबंधित है।
🧬 उत्परिवर्तन के कारण (Causes of Mutation)
उत्परिवर्तन दो प्रमुख तरीकों से उत्पन्न हो सकते हैं।
1.स्वतःस्फूर्त उत्परिवर्तन (Spontaneous Mutation)
DNA की प्रतिकृति या अन्य कोशिकीय प्रक्रियाओं के दौरान होने वाली प्राकृतिक त्रुटियों के कारण उत्पन्न उत्परिवर्तन को स्वतःस्फूर्त उत्परिवर्तन कहते हैं।
2.प्रेरित उत्परिवर्तन (Induced Mutation)
कुछ बाहरी कारकों के कारण उत्पन्न उत्परिवर्तन को प्रेरित उत्परिवर्तन कहते हैं। ऐसे कारकों को उत्परिवर्तक (Mutagens) कहा जाता है।
उदाहरण:
- कुछ प्रकार के विकिरण (Radiations)
- कुछ रासायनिक पदार्थ (Chemical Agents)
- कुछ जैविक कारक (Biological Agents)
🧬 आनुवंशिक विविधता (Genetic Variation)
एक ही प्रजाति के जीवों में पाए जाने वाले आनुवंशिक अंतर को आनुवंशिक विविधता (Genetic Variation) कहते हैं।
इसके प्रमुख स्रोत हैं:
- उत्परिवर्तन (Mutation)
- पुनर्संयोजन (Recombination)
- स्वतंत्र वर्गीकरण (Independent Assortment)
- पारगमन/क्रॉसिंग ओवर (Crossing Over)
- यादृच्छिक निषेचन (Random Fertilization)
आनुवंशिक विविधता के कारण संतानों में माता-पिता से समानता के साथ-साथ कुछ नए अंतर भी दिखाई दे सकते हैं।
🧬 क्रॉसिंग ओवर और आनुवंशिक पुनर्संयोजन
- क्रॉसिंग ओवर (Crossing Over) अर्धसूत्री विभाजन (Meiosis) के दौरान समजात गुणसूत्रों (Homologous Chromosomes) के बीच आनुवंशिक पदार्थ के आदान-प्रदान की प्रक्रिया है।
- यह सामान्यतः प्रोफेज-I (Prophase-I) में होता है।
- क्रॉसिंग ओवर से एलीलों (Alleles) के नए संयोजन बन सकते हैं। इसलिए यह आनुवंशिक पुनर्संयोजन (Genetic Recombination) और विविधता का महत्वपूर्ण स्रोत है।
🧬 उत्परिवर्तन का आनुवंशिक महत्व
- उत्परिवर्तन DNA में नए परिवर्तन उत्पन्न कर सकता है। यदि उत्परिवर्तन जनन कोशिकाओं (Germ Cells) से संबंधित हो और संतति तक पहुँच जाए, तो वह आगे की पीढ़ियों में भी संचरित हो सकता है।
- इसके विपरीत, केवल दैहिक कोशिकाओं (Somatic Cells) में होने वाला उत्परिवर्तन सामान्यतः संतति को सीधे विरासत में नहीं मिलता।
- उत्परिवर्तन और आनुवंशिक पुनर्संयोजन से उत्पन्न विविधता बदलती पर्यावरणीय परिस्थितियों के प्रति अनुकूलन में योगदान कर सकती है। इसी कारण ये विकास (Evolution) के लिए महत्वपूर्ण आनुवंशिक आधार माने जाते हैं।
🧬 उत्परिवर्तन के प्रभाव
उत्परिवर्तन का प्रभाव उसके प्रकार, स्थान और संबंधित जीन के कार्य पर निर्भर करता है।
- हानिकारक उत्परिवर्तन (Harmful Mutation): जीव के लिए नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है।
- लाभकारी उत्परिवर्तन (Beneficial Mutation): किसी विशेष परिस्थिति में जीव को लाभ पहुँचा सकता है।
- तटस्थ उत्परिवर्तन (Neutral Mutation): जिसका phenotype पर स्पष्ट प्रभाव नहीं पड़ता।
- हर DNA परिवर्तन आवश्यक रूप से रोग या हानिकारक लक्षण उत्पन्न नहीं करता।
🧬 आनुवंशिक रोग (Genetic Disorders)
जीन, DNA या गुणसूत्रों में होने वाले ऐसे परिवर्तन जिनके कारण किसी व्यक्ति में रोग या असामान्य लक्षण उत्पन्न हो सकते हैं, उन्हें आनुवंशिक रोग (Genetic Disorders) कहा जाता है।
आनुवंशिक रोगों को उनके कारण और वंशागति के आधार पर अलग-अलग प्रकारों में समझा जा सकता है। कुछ रोग एकल जीन में परिवर्तन के कारण होते हैं, जबकि कुछ गुणसूत्रों की संख्या या संरचना में परिवर्तन से संबंधित होते हैं।
🧬 वंशागति के प्रमुख प्रकार (Types of Inheritance)
1.स्वसूत्री प्रभावी वंशागति (Autosomal Dominant Inheritance)
जब रोग उत्पन्न करने वाला एलील किसी स्वसूत्र (Autosome) पर स्थित हो और उसकी एक प्रति ही रोग का phenotype प्रदर्शित करने के लिए पर्याप्त हो, तो इसे स्वसूत्री प्रभावी वंशागति कहते हैं।
ऐसे व्यक्ति में सामान्यतः:
AA या Aa → रोग का phenotype
जबकि:
aa → सामान्य
हो सकता है।
इस प्रकार की वंशागति में रोगग्रस्त व्यक्ति के बच्चे में रोग से संबंधित एलील प्राप्त होने की संभावना हो सकती है।
2.स्वसूत्री अप्रभावी वंशागति (Autosomal Recessive Inheritance)
जब रोग उत्पन्न करने वाला एलील स्वसूत्र पर स्थित हो और रोग का phenotype सामान्यतः तभी दिखाई दे जब उसकी दो अप्रभावी प्रतियाँ उपस्थित हों, तो इसे स्वसूत्री अप्रभावी वंशागति कहते हैं।
यदि किसी व्यक्ति में एक सामान्य और एक रोग-संबंधी अप्रभावी एलील हो तथा सामान्यतः रोग का phenotype दिखाई न दे, तो उसे वाहक (Carrier) कहा जाता है।
उदाहरण:
AA → सामान्य
Aa → वाहक
aa → रोगग्रस्त
सिकल सेल एनीमिया (Sickle Cell Anaemia) स्वसूत्री अप्रभावी वंशागति से संबंधित एक महत्वपूर्ण उदाहरण है।
- X-सहलग्न अप्रभावी वंशागति (X-linked Recessive Inheritance)
जब रोग उत्पन्न करने वाला अप्रभावी एलील X गुणसूत्र पर स्थित हो, तो इसे X-सहलग्न अप्रभावी वंशागति कहते हैं।
पुरुषों में एक ही X गुणसूत्र होता है। इसलिए X गुणसूत्र पर उपस्थित अप्रभावी रोग-संबंधी एलील के लिए पुरुष में दूसरा X allele नहीं होता जो उसे सामान्य phenotype दे सके।
उदाहरण:
- हीमोफीलिया (Haemophilia)
- लाल-हरा वर्णांधता (Red-Green Colour Blindness)
ये X-सहलग्न अप्रभावी वंशागति के महत्वपूर्ण उदाहरण हैं।
- X-सहलग्न प्रभावी वंशागति (X-linked Dominant Inheritance)
जब प्रभावी एलील X गुणसूत्र पर स्थित हो, तो इसे X-सहलग्न प्रभावी वंशागति (X-linked Dominant Inheritance) कहते हैं।
इसमें एक ही रोग-संबंधी प्रभावी allele phenotype प्रदर्शित करने के लिए पर्याप्त हो सकता है।
इस वंशागति की पहचान के लिए परिवार में रोग के संचरण का pattern देखा जाता है। विशेष रूप से पिता से पुत्र को X गुणसूत्र का प्रत्यक्ष संचरण नहीं होता, क्योंकि पिता अपने पुत्र को Y गुणसूत्र देता है।
- Y-सहलग्न वंशागति (Y-linked Inheritance)
जब कोई जीन या संबंधित लक्षण Y गुणसूत्र पर स्थित हो, तो इसे Y-सहलग्न वंशागति कहते हैं।
Y गुणसूत्र पिता से पुत्र को मिलता है। इसलिए Y-सहलग्न लक्षणों का संचरण:
पिता → पुत्र
के रूप में हो सकता है।
इस प्रकार के लक्षण महिलाओं में सामान्यतः नहीं पाए जाते क्योंकि उनमें Y गुणसूत्र नहीं होता।
- माइटोकॉन्ड्रियल वंशागति (Mitochondrial Inheritance)
- माइटोकॉन्ड्रिया में अपना DNA पाया जाता है। माइटोकॉन्ड्रियल DNA से संबंधित लक्षणों की वंशागति को माइटोकॉन्ड्रियल वंशागति (Mitochondrial Inheritance) कहते हैं।
- मनुष्यों में माइटोकॉन्ड्रिया सामान्यतः माता से संतानों में अधिक महत्वपूर्ण रूप से संचरित होते हैं, क्योंकि निषेचन के बाद भ्रूण को अधिकांश cytoplasm और mitochondria अंड कोशिका से प्राप्त होते हैं।
इसलिए माइटोकॉन्ड्रियल वंशागति को अक्सर मातृवंशीय वंशागति (Maternal Inheritance) कहा जाता है।
प्रमुख आनुवंशिक रोग — एक नजर में
| रोग | प्रमुख वंशागति/कारण | गुणसूत्रीय संरचना |
|---|---|---|
| सिकल सेल एनीमिया (Sickle Cell Anaemia) | स्वसूत्री अप्रभावी | — |
| हीमोफीलिया (Haemophilia) | X-सहलग्न अप्रभावी | — |
| लाल-हरा वर्णांधता (Red-Green Colour Blindness) | X-सहलग्न अप्रभावी | — |
| डाउन सिंड्रोम (Down Syndrome) | गुणसूत्र 21 की त्रिसूत्रता (Trisomy 21) | 47, +21 |
| टर्नर सिंड्रोम (Turner Syndrome) | एक X गुणसूत्र की कमी | 45,X |
| क्लाइनफेल्टर सिंड्रोम (Klinefelter Syndrome) | एक अतिरिक्त X गुणसूत्र | 47,XXY |
ये अवस्थाएँ मुख्यतः गुणसूत्रीय असामान्यताओं (Chromosomal Abnormalities) से संबंधित हैं।
🧬 वाहक (Carrier)
वाहक (Carrier) शब्द विशेष रूप से अप्रभावी आनुवंशिक रोगों के संदर्भ में महत्वपूर्ण है।
यदि किसी व्यक्ति में रोग-संबंधी अप्रभावी allele की एक प्रति और सामान्य allele की एक प्रति हो तथा रोग का phenotype सामान्यतः दिखाई न दे, तो वह व्यक्ति उस रोग का वाहक (Carrier) कहलाता है।
उदाहरण:
Aa → वाहक
यह अवधारणा स्वसूत्री अप्रभावी रोगों की वंशागति समझने में विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
🧬 आनुवंशिक रोगों की पहचान
आनुवंशिक रोगों की पहचान के लिए रोग के लक्षणों के साथ-साथ पारिवारिक इतिहास (Family History) और आवश्यक होने पर आनुवंशिक परीक्षणों का उपयोग किया जा सकता है।
कुछ स्थितियों में निम्न प्रकार के परीक्षण उपयोगी हो सकते हैं:
- कैरियोटाइपिंग (Karyotyping)
- DNA परीक्षण (DNA Testing)
- आनुवंशिक परीक्षण (Genetic Testing)
कैरियोटाइपिंग विशेष रूप से गुणसूत्रों की संख्या और बड़ी संरचनात्मक असामान्यताओं की पहचान में उपयोगी है।
✅ महत्वपूर्ण तथ्य — आनुवंशिकी (Genetics)
- आनुवंशिकी (Genetics) आनुवंशिकता और विविधता का अध्ययन है।
- ग्रेगर जॉन मेंडल (Gregor Johann Mendel) को आनुवंशिकी का जनक कहा जाता है।
- DNA की द्विकुंडली संरचना का मॉडल James Watson और Francis Crick ने 1953 में प्रस्तुत किया।
- DNA में एडेनिन (A)–थाइमिन (T) के बीच 2 तथा ग्वानिन (G)–साइटोसिन (C) के बीच 3 हाइड्रोजन बंध होते हैं।
- DNA की दोनों शृंखलाएँ प्रतिसमानांतर (Antiparallel) होती हैं।
- DNA की प्रतिकृति अर्ध-संरक्षी (Semiconservative) होती है।
- जीन (Gene) DNA का विशिष्ट आनुवंशिक अनुक्रम है।
- mRNA आनुवंशिक संदेश को राइबोसोम तक पहुँचाता है, tRNA अमीनो अम्ल लाता है और rRNA राइबोसोम का प्रमुख घटक है।
- प्रतिलेखन (Transcription) में DNA से RNA और अनुवादन (Translation) में RNA की सूचना से प्रोटीन बनता है।
- सामान्य एकसंकर संकरण में F₂ का लक्षणप्ररूपी अनुपात 3 : 1 होता है।
- सामान्य द्विसंकर संकरण में F₂ का लक्षणप्ररूपी अनुपात 9 : 3 : 3 : 1 होता है।
- उत्परिवर्तन (Mutation) DNA या आनुवंशिक पदार्थ में होने वाला स्थायी परिवर्तन है।
- हीमोफीलिया (Haemophilia) और लाल-हरा वर्णांधता सामान्यतः X-सहलग्न अप्रभावी वंशागति से संबंधित हैं।
- डाउन सिंड्रोम (Down Syndrome) सामान्यतः गुणसूत्र 21 की त्रिसूत्रता से संबंधित है।
- टर्नर सिंड्रोम (Turner Syndrome) = 45,X और क्लाइनफेल्टर सिंड्रोम (Klinefelter Syndrome) = 47,XXY।
❓ FAQs — आनुवंशिकी (Genetics)
आनुवंशिकी क्या है?
उत्तर: आनुवंशिकता और विविधता के अध्ययन को आनुवंशिकी कहते हैं।
आनुवंशिकी का जनक किसे कहा जाता है?
उत्तर: ग्रेगर जॉन मेंडल को आनुवंशिकी का जनक कहा जाता है।
DNA की द्विकुंडली संरचना किसने प्रस्तुत की?
उत्तर: James Watson और Francis Crick ने 1953 में DNA की द्विकुंडली संरचना का मॉडल प्रस्तुत किया।
DNA में एडेनिन किसके साथ युग्म बनाता है?
उत्तर: एडेनिन (A), थाइमिन (T) के साथ युग्म बनाता है।
ग्वानिन और साइटोसिन के बीच कितने हाइड्रोजन बंध होते हैं?
उत्तर: ग्वानिन (G) और साइटोसिन (C) के बीच 3 हाइड्रोजन बंध होते हैं।
RNA में थाइमिन के स्थान पर कौन-सा क्षार पाया जाता है?
उत्तर: RNA में थाइमिन के स्थान पर यूरैसिल (Uracil) पाया जाता है।
जीन क्या है?
उत्तर: जीन DNA का एक विशिष्ट अनुक्रम है, जिसमें आनुवंशिक सूचना निहित होती है।
प्रतिलेखन क्या है?
उत्तर: DNA की सूचना के आधार पर RNA बनने की प्रक्रिया प्रतिलेखन कहलाती है।
अनुवादन कहाँ होता है?
उत्तर: अनुवादन राइबोसोम (Ribosome) पर होता है।
एकसंकर संकरण का सामान्य F₂ लक्षणप्ररूपी अनुपात क्या है?
उत्तर: सामान्यतः 3 : 1।
द्विसंकर संकरण का सामान्य F₂ लक्षणप्ररूपी अनुपात क्या है?
उत्तर: सामान्यतः 9 : 3 : 3 : 1।
वाहक (Carrier) किसे कहते हैं?
उत्तर: अप्रभावी आनुवंशिक रोग के संदर्भ में सामान्य allele और रोग-संबंधी अप्रभावी allele वाला, सामान्यतः बिना रोग phenotype का व्यक्ति वाहक कहलाता है।
हीमोफीलिया किस प्रकार की वंशागति से संबंधित है?
उत्तर: सामान्यतः X-सहलग्न अप्रभावी वंशागति से।
डाउन सिंड्रोम किससे संबंधित है?
उत्तर: गुणसूत्र 21 की अतिरिक्त प्रति अर्थात् त्रिसूत्रता 21 से।
उत्परिवर्तन क्या है?
उत्तर: DNA या आनुवंशिक पदार्थ में होने वाला स्थायी परिवर्तन उत्परिवर्तन कहलाता है।
🎯 प्रतियोगी परीक्षा टिप्स
- DNA → आनुवंशिक सूचना; जीन → DNA का विशिष्ट अनुक्रम; गुणसूत्र → DNA और प्रोटीन की संगठित संरचना।
- A–T = 2 हाइड्रोजन बंध, G–C = 3 हाइड्रोजन बंध।
- प्रतिलेखन → DNA से RNA; अनुवादन → RNA से प्रोटीन।
- एकसंकर F₂ = 3 : 1; द्विसंकर F₂ = 9 : 3 : 3 : 1।
- हीमोफीलिया → X-सहलग्न अप्रभावी; सिकल सेल एनीमिया → स्वसूत्री अप्रभावी।
- Down = Trisomy 21, Turner = 45,X, Klinefelter = 47,XXY।
🏁 निष्कर्ष
आनुवंशिकी जीवों में लक्षणों के संचरण और विविधता को समझने का आधार है। DNA आनुवंशिक सूचना का प्रमुख वाहक है और जीन इसी DNA में स्थित विशिष्ट अनुक्रम होते हैं। DNA की सूचना RNA के माध्यम से प्रोटीन निर्माण में उपयोग होती है। मेंडल के नियम लक्षणों की वंशागति को समझने में आधारभूत भूमिका निभाते हैं। उत्परिवर्तन और आनुवंशिक पुनर्संयोजन विविधता के महत्वपूर्ण स्रोत हैं। जीन तथा गुणसूत्रों में परिवर्तन कुछ आनुवंशिक रोगों से संबंधित हो सकते हैं। स्वसूत्री, X-सहलग्न, Y-सहलग्न और माइटोकॉन्ड्रियल वंशागति के patterns को समझना प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
✍️ अभ्यास प्रश्न — आनुवंशिकी (Genetics)
- आनुवंशिकी के जनक किसे कहा जाता है?
- DNA की द्विकुंडली संरचना का मॉडल किसने प्रस्तुत किया?
- DNA की संरचनात्मक इकाई क्या है?
- DNA में A किसके साथ युग्म बनाता है?
- G और C के बीच कितने हाइड्रोजन बंध होते हैं?
- DNA प्रतिकृति किस प्रकार की होती है?
- जीन किसे कहते हैं?
- जीन का गुणसूत्र पर निश्चित स्थान क्या कहलाता है?
- DNA से RNA बनने की प्रक्रिया क्या कहलाती है?
- RNA से प्रोटीन बनने की प्रक्रिया क्या कहलाती है?
- mRNA का प्रमुख कार्य क्या है?
- tRNA का प्रमुख कार्य क्या है?
- एकसंकर संकरण का F₂ लक्षणप्ररूपी अनुपात क्या है?
- द्विसंकर संकरण का F₂ लक्षणप्ररूपी अनुपात क्या है?
- मेंडल का पृथक्करण का नियम क्या बताता है?
- उत्परिवर्तन किसे कहते हैं?
- Crossing Over किस विभाजन के दौरान होता है?
- हीमोफीलिया किस प्रकार की वंशागति का उदाहरण है?
- डाउन सिंड्रोम किस गुणसूत्र से संबंधित है?
- 20. टर्नर और क्लाइनफेल्टर सिंड्रोम के सामान्य गुणसूत्रीय संयोजन क्या है ?



